कासगंज। जिले में गर्भाशय टीबी का साया महिलाओं के मातृत्व पर गहरा रहा है। यह बीमारी खासकर युवा महिलाओं में तेजी से बढ़ रही है। लक्षणों की देर से पहचान के कारण स्थिति गंभीर हो रही है जिससे बांझपन का खतरा बढ़ता जा रहा है।
सीएमएस डॉ. संजीव सक्सेना के अनुसार, गर्भाशय की टीबी गर्भाशय की अंदरूनी परत को संक्रमित करती है। इस कारण भ्रूण का सही विकास नहीं हो पाता है। इससे गर्भधारण में कठिनाई या असफलता की स्थिति बन सकती है। कई मामलों में इस बीमारी के लक्षण स्पष्ट नहीं होते हैं। इस कारण लंबे समय तक इसका पता नहीं चल पाता है।
स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार, 25 से 40 वर्ष की आयु वर्ग की महिलाएं सबसे अधिक प्रभावित हो रही हैं। देर से पहचान और उपचार में लापरवाही समस्या को और जटिल बना देती है। विशेषज्ञों का कहना है कि समय पर जांच और सही इलाज से महिलाएं स्वस्थ होकर मां बनने का सुख प्राप्त कर सकती हैं। समय रहते उचित उपचार से गर्भाशय टीबी को पूरी तरह ठीक किया जा सकता है। इलाज के बाद कई महिलाएं सफलतापूर्वक गर्भधारण भी कर रही हैं जो प्रभावित महिलाओं के लिए एक उम्मीद की किरण है।
गर्भाशय टीबी के लक्षण
पसीना अधिक आना, थकान रहना, पेट के निचले हिस्से में तेज दर्द रहना, अनियमित मासिक धर्म, सफेद पानी आना, अत्यधिक रक्त स्राव, उल्टी, वजन का कम होना, हल्का बुखार, हार्ट की पल्स रेट का तेज हो जाना, गर्भपात हो जाना आदिे।
टीबी संक्रमण की जांच और उपचार
टीबी संक्रमण का पता लगाने के लिए कई जांचें उपलब्ध हैं। इनमें ट्यूबरकुलिन स्किन टेस्ट, रक्त जांच, गर्भाशय की बायोप्सी और आनुवंशिक जांच शामिल हैं। ये सभी जांचें टीबी के संक्रमण की पुष्टि करती हैं। संक्रमित मरीजों को छह महीने तक नियमित दवा दी जाती है।
- शहर की 28 वर्षीय महिला बताती हैं कि उनका पहला बच्चा तो समय पर हो गया, लेकिन दूसरा बच्चा होते समय दिक्कत आने लगी। जब चिकित्सक को दिखाया तो अंडाशय में टीबी पाई गई। इलाज कराने के बाद दूसरा बच्चा हुआ।
- 30 वर्षीय महिला बताती हैं कि शादी के चार साल बाद भी बच्चा नहीं हुआ तो चिकित्सक को दिखाया। जांच में गर्भाशय की फैलोपियन ट्यूब में गांठ पाई गई। इलाज कराने के बाद मातृत्व सुख प्राप्त हो गया।