विश्व दृष्टि दिवस :
कासगंज। मोबाइल और कंप्यूटर स्क्रीन पर घंटों नजरें टिकाए रखने का असर बच्चों की आंखों पर पड़ रहा है। कम उम्र में ही नजर कमजोर होने के मामले सामने आ रहे हैं। जिले में राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (आरबीएसके) के तहत सत्र 2025-26 में 968 बच्चों को चश्मे वितरित किए गए। जिला अस्पताल में भी आंखों से जुड़ी समस्या लेकर प्रतिदिन 4 से 5 बच्चे पहुंचते हैं।
नेत्र रोग विशेषज्ञ एवं सीएमएस डॉ. संजीव सक्सेना ने बताया कि बच्चों में कमजोर नजर की समय पर पहचान और उपचार जरूरी है। जन्म से या बचपन में नजर कमजोर होने पर समय से चश्मा न लगने पर आगे चलकर ‘लेजी आई’ यानी एंब्लायोपिया की समस्या हो सकती है। इसमें प्रभावित आंख की दृष्टि का विकास पूरी तरह नहीं हो पाता और बाद में इसे सामान्य करना मुश्किल हो जाता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, मोबाइल, कंप्यूटर और लैपटॉप की स्क्रीन को लंबे समय तक लगातार देखने से आंखों पर दबाव पड़ सकता है। कम रोशनी में पढ़ना या मोबाइल चलाना, लेटकर स्क्रीन देखना और लंबे समय तक बिना ब्रेक के स्क्रीन देखना भी आंखों के लिए नुकसानदायक है। बच्चों के स्क्रीन टाइम को नियंत्रित करने के साथ बीच-बीच में आंखों को आराम देना जरूरी है।
अभिभावकों को बच्चों की आंखों में किसी तरह की परेशानी दिखाई देने पर इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। चिकित्सक और ऑप्टोमेट्रिस्ट बच्चों को आंखों की देखभाल और रोजमर्रा की आदतों में सुधार के संबंध में भी सलाह देते हैं।
-
वर्जन
बच्चों में दृष्टि संबंधी समस्याओं की समय पर पहचान के लिए राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम संचालित किया जा रहा है। स्कूलों और अन्य स्थानों पर स्वास्थ्य जांच के दौरान बच्चों की आंखों की रोशनी भी जांची जाती है। कमजोर नजर वाले बच्चों की पहचान कर उन्हें आवश्यक उपचार और चश्मा उपलब्ध कराया जाता है। - डॉ. अजय कुमार, सीएमओ