कासगंज। लाहौर में कांग्रेस के अधिवेशन के दौरान पूर्ण स्वराज की मांग का निर्णय लिए जाने के बाद, देश के स्वतंत्रता आंदोलन को धार देने के लिए वर्ष 1929 में महात्मा गांधी कासगंज आए थे। बापू के आगमन की भनक लगते ही शहर में आजादी के दीवानों का भारी हुजूम उमड़ पड़ा था। आंदोलन के लिए धन की कोई कमी आड़े न आए, इसलिए महिलाओं ने अपने गहने तक उतारकर महात्मा गांधी को सौंप दिए थे।
गांधीजी का यह कार्यक्रम पूरी तरह गोपनीय रखा गया था और केवल गिने-चुने कांग्रेस नेताओं को ही इसकी जानकारी थी। तय योजना के मुताबिक शहर के प्रभुपार्क जो तब अचल ताल कहलाता था में सभा होनी थी, जहां लोगों की भीड़ जुट गई।
इसके बाद उन्हें गुपचुप तरीके से रेलवे रोड स्थित गंगा चुंगी धर्मशाला ले जाया गया जिसका अस्तित्व आज भी मौजूद है। जब लोगों को इसकी भनक लगी, तो वे वहां भी पहुंच गए। बापू ने धर्मशाला में सभा कर लोगों से पूर्ण आजादी की लड़ाई के लिए तैयार रहने का आह्वान किया। इसके बाद उन्होंने गांव पिवारी में ठाकुर माधोसिंह के घर पहुंचकर ग्रामीणों से मुलाकात की, जहां भी भारी संख्या में लोग एकत्रित हुए थे।
प्रभुपार्क और रेलवे रोड के बीच स्थापित है प्रतिमा
देश की आजादी के बाद, प्रभुपार्क और रेलवे रोड के बीच स्थित इसी ऐतिहासिक चौराहे पर महात्मा गांधी की प्रतिमा स्थापित की गई, जिसे आज गांधी मूर्ति चौराहा के नाम से जाना जाता है।
गांधीजी ने शहर में सभा के दाैरान लोगों से पूर्ण आजादी की लड़ाई के लिए तैयार रहने का आह्वान किया। महिलाओं ने इस सभा में अपने गहने उतारकर उन्हें साैंप दिए थे। उनके आगमन से लोगों में उत्साह था। - मुनेंद्र पाल सिंह राजपूत, एडवोकेट
देश की आजादी के लिए जिले के लोगों में काफी जोश रहा था। गांधीजी के आगमन के बाद लोगों ने आजादी के आंदोलन में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया। तमाम लोगों ने जेल में यातनाएं तक झेलीं। -डॉ. अखिलेश गौड़
कासगंज में स्थित गांधी मूर्ति ।संवाद
कासगंज में स्थित गांधी मूर्ति ।संवाद
कासगंज में स्थित गांधी मूर्ति ।संवाद