डीएफओ ने बताया कि हाल ही में एक्ट संशोधन में बंदरों को वन्य जीव श्रेणी से बाहर कर दिया है। गाय, कुत्ते भी वन्य जीव श्रेणी में नहीं आते। इसलिए विभाग जिम्मेदार नहीं होता। लेकिन मानवीय संवेदना के तहत वह कार्रवाई कराएंगे। डीएफओ के मुताबिक यहां ज्यादातर रिसार्स मैकॉक प्रजाति के बंदर पाए जाते हैं।
छह माह में कई हो चुके घायल
तिंदवारी। पिपरगवां गांव में भी बंदरों का आतंक है। करीब छह माह में लगभग दर्जनभर लोग बंदरों के हमले में घायल हो चुके हैं। बंदरों के काटने पर तमाम ग्रामीणों को पीएचसी और जिला अस्पताल में एंटी रैबीज वैक्सीन लगवाना पड़ी। अभी भी बंदरों का आतंक है। ग्रामीण लगातार इन्हें पकड़वाने के लिए उच्चाधिकारियों से मांग कर रहे हैं।
बंदरों के हमले में महिला की भी गिरने से हो चुकी है मौत
तिंदवारी। ब्लॉक के छापर गांव में ही दो माह पूर्व भी 65 वर्षीय तेजनिया बंदरों के खदेडने गई थी। इस दौरान बंदरों ने उस पर हमला कर दिया था। बंदरों से बचने के लिए भागने समय वह छत से गिरकर गंभीर रूप से घायल हो गई थी। परिजन उसे अस्पताल लाने की तैयारी कर रहे थे। तब तक उसने दम तोड़ दिया था।
घटना पर ग्रामीणों में रोष
ग्राम प्रधान समेत परिजनों और ग्रामीणों ने घटना पर रोष जताया है। उन्होंने कहा कि कई माह से गांव में बंदरों का आतंक है। इनके भय के चलते बच्चे छत पर नहीं जा पाते। कई ग्रामीणों को खदेड़कर काट चुके हैं। छापर गांव के अलावा माटा, जसईपुर, भिड़ौरा आदि गांवों में भी बंदरों का आतंक है।
बंदरों से परेशान उक्त गांवों के ग्रामीणों ने कई बार प्रशासन और वन विभाग के अधिकारियों से शिकायत की, लेकिन किसी ने सुध नहीं ली। बंदरों को पकड़कर जंगल में छुड़वा दिया जाता, तो शायद मासूम की जान बच जाती। इसके बाद भी अभी तक प्रशासन की ओर से कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है।