पंकज प्रसून कानपुर।कोरोना संक्रमण के चलते लगाए गए लाग डाउन में एक तरफ जहां देशभर के विभिन्न राज्यों में रोजी रोटी के लिए गए प्रवासी श्रमिक अपने घरों को वापस आ चुके हैं,वही कानपुर से सटे गंगा नदी के किनारे बसे ऐसे कई गांव हैं, जहां के लोग आज तक कहीं बाहर रोजी रोटी कमाने के लिए नहीं गए।इन गांव के लोगों का मूल व्यवसाय खेती है।इसके अलावा जब कुछ समय यहां के लोगों को मिलता है तो वह मिस्त्री का काम सब्जी बेचने का काम या इसी तरह से कुछ और काम करके अपना जीवन यापन कर लेते हैं। इन लोगों के बीच शुक्रवार को जब अमर उजाला की टीम पहुंची तो दूसरे गांव जैसा किसी भी तरह का कोई मलाल यहां लोगों के चेहरे पर नहीं नजर आया। दो महीने के इस लाक डाउन के बावजूद यहां के गांव में सभी के चेहरे पर खुशी नजर आई। यहां के लोगों का कहना है कि बूढ़े से लेकर युवक महिलाएं सभी को जो मौका मिलता है वह काम कर लेता है। \" मेरी उम्र 65 साल की है मैं और मेरा परिवार पूरी तरह से खेती से होने वाली आय से अपना जीवन यापन करते हैं। इसमें से जो समय मिलता है,उसी में हमने गांव में ही एक छोटी सी दुकान खोल रखी है। जब समय मिलता है तो उस दुकान पर बैठते हैं,नहीं तो अपनी खेती के काम में लगे रहते हैं। इस गांव में आज तक कोई भी बाहर कमाने नहीं गया। ना ही कोई इस बारे में सोचता है।इसकी एक वजह यह भी है कि कानपुर जैसा बड़ा शहर उनके समीप है और लोगों का जीवन यापन यहीं पर हो जा रहा है। रामदयाल निवासी रामा निहालपुर मैंने और मेरे परिवार के किसी भी सदस्य ने कभी बाहर जाने की सोचा ही नहीं। मेरे पास अपनी खेती है, उसी से मेहनत करके जो निकलता है परिवार चलाते हैं। इसके अलावा समय निकालकर शहर के आसपास जो भी काम निकलता है, वहां जाकर रोजगार भी कर लेते हैं। मेरी उम्र 30 साल की है बचपन से मैं यही देखता जा रहा हूं कि मेरे कोई भी संगी साथी कहीं परदेस जाकर कमाने के लिए नहीं गए। सब यहीं रहते हैं और खुश रहते हैं। रोहित कुमार निवासी नत्था पुरवा हमारे गांव से शहर की दूरी ज्यादा नहीं है, इस वजह से भी जिन युवकों के पास खेती से समय निकल आता है, वह शहर में सब्जी बेचना, पेंटिंग का काम, प्लंबर का काम करने निकल जाते हैं,और जरूरत भर की कमाई कर लेते हैं ।जिससे उन्हें कहीं दूसरे शहर जाकर रोजगार ढूंढने की जरूरत नहीं पड़ती। रामचंद्र निवासी कल्लू पुरवा पिछले 40 सालों से मैं यही देखता रहा हूं कि हमारे आसपास के जितने भी गांव हैं, यहां से कभी कोई बाहर कमाने के लिए नहीं गया। लाक डाउन के दौरान जब प्रवासी मजदूरों के सैकड़ों मील पैदल चलने की खबरें आ रही थी, तब इन गांव के लोगों में इस बात की चर्चा चल रही थी कि बाहर जाने से अच्छा अपने गांव और घर पर ही रह कर कुछ किया जा सकता है। अब जिस तरह की स्थिति पैदा हुई है, उससे पूरी उम्मीद है कि आने वाले वर्षों में भी यहां के गांव से बाहर जाकर कोई भी कमाने कि नहीं सोचेगा। रामदास पूर्व प्रधान कटरी शंकरपुर सराय इन गांव के लोग बाहर नहीं गए कमाने कटरी शंकरपुर सराय, रामा निहालपुर, नत्थापुरवा,मंगल पुरवा, छोटा मंगलपुर, पहाड़ीपुर,चैन पुरवा, धरमखेड़ा, रामपुर, मिट्ठन पुरवा,बलुवा खेड़ा,कल्लू पुरवा।