चुनाव लड़ने के लिए ददुआ की इजाजत लेनी पड़ती थी
70 के दशक में ददुआ का नाम चंबल के बीहड़ों में दहशत का पर्याय था। लगभग 30 साल चले ददुआ के आतंक का आलम यह था कि अगर किसी को प्रधान, विधायक और सांसद का चुनाव लड़ना होता था। तो ददुआ के आगे चढ़ावा चढ़ाना पड़ता था। हर चुनाव की फीस तय थी। इसके बिना कोई भी नेता चुनाव में आगे नहीं बढ़ सकता था।
400 से ज्यादा मामले दर्ज, 150 से अधिक हत्याएं
पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक, ददुआ पर 400 मामले दर्ज थे, जिनमें 200 डकैती, अपहरण और 150 हत्याएं शामिल थीं। पुलिस और एसटीएफ ने मानिकपुर थाना क्षेत्र के आल्हा गांव के पास झालवाल में 22 जुलाई 2007 को एनकाउंटर में छह लाख के इनामी ददुआ को मार गिराया था।