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तंदूर जैसे तपती ट्रेनों से उतरे प्रवासी मजदूरों को छलका दर्द

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खबर दिव्यांश सिंह फोटो अर्पण जी के पास है। तंदूर जैसे तपती ट्रेनों से उतरे प्रवासी मजदूरों को छलका दर्द - प्रवासी मजदूरों का छलका दर्द, बोले ईद है लेकिन पैसा नहीं रुखा सुखा खाकर मनाएंगे ईद - भूखे पेट रहे तो कभी उबले चावल खाकर गुजारे दिन संवाद न्यूज एजेंसी कानपुर। 45 डिग्री तापमान में सूरज की गर्मी से तंदूर जैसी तपती ट्रेनों से उतरे प्रवासी श्रमिकों का हाल बेहाल था । तेज गर्मी के बीज गला सूख रहा था , पानी की बोतल रखी देख खुद ब खुद कदम बोतलों की ओर बढ़ लिए, जिनको कानपुर उतरना था वह भी पानी की बोतल ले रहे थे और जो ट्रेन के भीतर बैठे थे वह भी रेल प्रशासन से गुहार लगा रहे थे हमको भी पानी पहुंचा दो। बहरहाल रेलवे के लोगों ने हर कोच में पानी की बोतल पहुंचाई। देश के बड़े शहरों में कमाने वाले दिहाड़ी मजदूर बेहद निराश हैं। सोमवार को अहमदाबाद और बंगलुरु समेत देश के कई बड़े शहरों से कानपुर सेंट्रल पहुंची स्पेशल श्रमिक ट्रेन से उतरने वाले मजदूरों ने अपनी आपबीती बताई, तो हमारे भी पैरों तले जमीन खिसक गई। किसी के घर में मातम छाया है, तो कोई त्यौहार में अपने घर पहुंचा है। जेब में पैसा नहीं है , इसलिए त्यौहार भी नहीं मनेगा। कानपुर सेंट्रल उतरे प्रवासी श्रमिकों को पानी की बोतल और लंच पैकेट दिया गया। कानपुर उतरे सभी प्रवासी श्रमिकों और उनके परिवार की थर्मल स्क्रीनिंग की गई, उसके बाद रोडवेज की बसों से उनको गृह जनपद के लिए रवाना किया गया। उबले चावल खाकर और भूखे पेट गुजारे लॉकडाउन के दिन गुजरात के अहमदाबाद से आई उन्नाव निवासी नीलू ने बताया उनके पति सिलाई की दुकान में काम करते थे। लॉकडाउन के बाद से दुकान बंद हो गई कोई हमारी सुध लेने वाला भी नहीं था हम जी रहे हैं या मर रहे। जब तक घर में राशन था तब तक खाया, कुछ दिन बाद दुकान वाले ने उधार राशन देना भी बंद कर दिया। घर में बचा हुआ चावल रखा था, उसको उबालकर खाते रहे जब वह खत्म हो गया तो पड़ोसियों ने कभी पेट भरा तो कभी भूखे पेट ही सो गए। ऐसा ही दर्द वहां कईयों का था। हर कोई अपने पेट की भूख से उठने वाली तड़फ को बता रहा था। ऐसी दुश्वारियां सहने के बाद श्रमिक अब दोबारा किसी बड़े शहर जाने की बात नहीं कर रहे हैं। घर में दो अर्थियां उठ गई, अफसोस हम पहुंच नहीं पाए बंगलुरु से अपनी पत्नी पूनम और छोटे बच्चे के साथ कानपुर सेंट्रल पर उतरे प्रयागराज निवासी विनोद बताते हैं। घर में दादा और भतीजे की मौत हो गई। अर्शी उठकर श्मशान घाट पहुंच गई, हम उनको आखिरी बार अपनी आंखों से देख तक नहीं सके। बंगलुरु में एक कंपनी में दिहाड़ी पर नौकरी करते हैं। विनोद का कहना है पेट की भूख से तो तड़प ही रहे थे, घर में दो मौतों का पता चलते ही मानो ऐसा लगा शीशा पिघल कर देह में घुस गया हो। आज शाम तक उम्मीद है घर पहुंच जाएंगे। अब जो अपने भगवान को प्यारे हो गए, वह तो नहीं मिलेंगे। लेकिन जो बच्चे हैं उनके गले लग रोउंगा और अपनी कसक निकाल लूंगा। एक बिस्कुट पैकेट और पानी की बोतल के सहारे तय किया 24 घंटे का सफर अहमदाबाद से चलकर कानपुर सेंट्रल पहुंची श्रमिक ट्रेन के यात्रियों ने बताया अहमदाबाद से चलने के बाद सिर्फ एक बोतल पानी और बिस्कुट पैकेट मिला था। उसी के सहारे हमने 24 घंटे में अहमदाबाद से कानपुर पहुंचने तक का सफर तय किया है। रास्ते में ट्रेन कई जगह रुकी, लेकिन कहीं भी पानी या लंच नहीं मिला। अब कानपुर उतरे हैं तो स्टेशन के बाहर लंच और पानी मिल रहा है। शिया युवा यूनिट के कार्यकर्ताओं ने स्टेशन पर बांटी ईदी (फोटो अर्पण) ईद के मौके पर ऑल इंडिया शिया युवा यूनिट के कार्यकर्ताओं ने कानपुर सेंट्रल स्टेशन पर श्रमिकों के बीच फ्रूटी, केले, लंच पैकेट, पानी के पाउच और बिस्कुट आदि का वितरण किया। इस मौके पर संस्था के चेयरमैन शहाब रिजवी, महासचिव नायाब आलम शारिब अब्बास, नाजिश रिजवी, आमिर अब्बास और दानिश रिजवी मौजूद रहे। वही पहल सामाजिक सेवा संस्थान द्वारा ईद के मौके पर कानपुर सेंट्रल रेलवे स्टेशन में 500 लंच पैकेट और पानी के पाउच का वितरण किया गया। इस मौके पर अजय कुमार द्विवेदी , पीयूष तिवारी और राजीव दीक्षित आदि मौजूद रहे। बातचीत (फोटो मेल कर दी है) अहमदाबाद में सिलाई की दुकान में काम करते हैं। लॉक डाउन के बाद सबसे ज्यादा समस्या खाने की हुई। कई दफा तो भूखे पेट रहना पड़ा। अजय, निवासी रायबरेली बंगलुरु में ठेकेदार के अंडर में दिहाड़ी मजदूरी करते थे। लॉकडाउन के बाद ठेकेदार को काम नहीं मिला , तो हम भी बेरोजगार हो गए। जैसे तैसे उधारी लेकर या पड़ोसियों के सहारे पेट भरा है। अब दोबारा लौटकर कहीं नहीं जाएंगे। राजेंद्र प्रसाद गुप्ता , निवासी प्रयागराज
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