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इंटरनेशनल डे ऑफ अनबॉर्न चाइल्ड: मां का कुपोषण गर्भस्थ शिशु के अधिकार का हनन, कोख में ही मिल जाते हैं अधिकार

Sun, 26 Mar 2023 11:12 AM IST
शिखा पांडेय न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर

सार

मां गर्भ में अस्तित्व में आने के बाद गर्भस्थ शिशु को अधिकार प्राप्त हो जाते हैं। अगर संपत्ति का बंटवारा होता है तो भी उसका हिस्सा लगेगा। किन्हीं कारणों से अगर उसकी मौत हो जाती है, तब उसका हिस्सा दूसरे हिस्सेदारों को दे दिया जाएगा।
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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अगर मां कुपोषित है तो यह गर्भस्थ शिशु के अधिकारों का हनन है। मां का कुपोषण उसे बीमार कर सकता है। अगर उसकी सेहत मां के कुपोषण के कारण गर्भावस्था के दौरान खराब हो गई और बाद में भी वह भी बीमारी बनी रही तो वह बालिग होने के बाद मुकदमा करके दोषी से हर्जाना वसूल सकता है। मां की कोख में अजन्मे शिशु को वही अधिकार प्राप्त हैं जो पैदा होने के बाद होते हैं।

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भारतीय बालरोग अकादमी के नेशनल लीगल चैप्टर के चेयरमैन डॉ. जेके गुप्ता ने यह बात शनिवार को इंटरनेशनल डे ऑफ अनबॉर्न चाइल्ड के मौके पर बताई। उन्होंने बताया कि गर्भस्थ शिशु की जान को खतरे से बचाने के लिए आईपीसी का सुरक्षा कवच है। इस बार इंटरनेशनल डे ऑफ अनबॉर्न चाइल्ड पर अजन्मे हर बच्चे को सम्मान थीम दी गई है। केशवपुरम में आयोजित गोष्ठी में डॉ. गुप्ता ने बताया कि मानव जीवन को सम्मान और उसकी कीमत का अहसास कराने के लिए इस दिवस की शुरुआत हुई है।

उन्होंने बताया कि मां गर्भ में अस्तित्व में आने के बाद गर्भस्थ शिशु को अधिकार प्राप्त हो जाते हैं। अगर संपत्ति का बंटवारा होता है तो भी उसका हिस्सा लगेगा। किन्हीं कारणों से अगर उसकी मौत हो जाती है, तब उसका हिस्सा दूसरे हिस्सेदारों को दे दिया जाएगा। उन्होंने बताया कि आईपीसी के सेक्शन 315 में गड़बड़ी से बच्चे की जान पर खतरा आने पर दोषी के लिए 10 साल की सजा है। अगर बच्चा पैदा होने के तुरंत बाद कोई ऐसी गड़बड़ी होती है जिससे उसकी मौत हो जाए तो दंड का प्रावधान सेक्शन 316 के तहत है।

लॉ आफ टॉर्टस के तहत यह प्रावधान है कि किसी दवा से बच्चे को गड़बड़ी हुई है तो बच्चा बड़े होकर हर्जाना लेने का हकदार है। भ्रूण हत्या के मामले में इन्हीं कानूनों के तहत सजा दी जाती है। जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के विभागाध्यक्ष डॉ. यशवंत राव ने बताया कि 23 सप्ताह के बाद गर्भस्थ शिशु को जीवित माना जाता है। उसी समय से उसके पास भरपूर अधिकार होते हैं।

1999 में हुई थी इंटरनेशनल डे ऑफ अनबॉर्न चाइल्ड की शुरुआत
इंटरनेशनल डे ऑफ अनबॉर्न चाइल्ड की शुरुआत वर्ष 1999 से शुरू हुई। 25 मार्च को इसकी शुरुआत जॉन पॉल द्वितीय ने करवाई थी। इसका मकसद मानव जीवन के प्रति संवेदनशीलता और सम्मान पैदा करना था।

आंकड़ा
- साल में गर्भवतियों के होते औसत 82 हजार रजिस्ट्रेशन
- प्रतिदिन होते हैं औसत 224 रजिस्ट्रेशन
- अति कुपोषित गर्भवतियों की संख्या- 15 फीसदी
- संयत कुपोषित गर्भवतियां- 40 फीसदी
- खून की कमी- 60 फीसदी गर्भवतियों में
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गर्भस्थ शिशु को हो सकतीं ये दिक्कतें
- बाधित शारीरिक विकास और विकार
- न्यूरल ट्यूब में गड़बड़ी
- मस्तिष्क का विकास न होना
- शारीरिक अंग का विकास ढंग से न हो पाना
- मस्तिष्क की न्यूरल सर्किट में गड़बड़ी
- गर्भस्थ शिशु को एनीमिया
- पैदा होने पर हाइपोथर्मिया, कैल्शियम की कमी
(स्त्री रोग विभाग की प्रोफेसर डॉ. सीमा द्विवेदी)
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