इस तरह ली गई थी जमीन, 65 करोड़ लागत
वर्ष 2016 में 15 हजार दर्शकों की क्षमता वाले क्रिकेट स्टेडियम बनाने के लिए 65 करोड़ 40 लाख रुपये का प्रस्ताव बना था। उसके तहत गदनपुर बड्डू में ग्राम समीज को अधिग्रहित किया गया था। किसानों से करीब 18 एकड़ जमीन ली गई थी।
निर्माण का कोई काम आगे नहीं बढ़ सका
मुआवजे के तौर पर उन्हें नौ करोड़ 32 लाख रुपये दिए गए थे। जीटी रोड किनारे और सुगंध व सुरस विकास केंद्र (एफएफडीसी) के ठीक पीछे गदनपुर बडडू में क्रिकेट स्टेडियम के लिए करीब 400 बीघा जमीन का अधिग्रहण हुआ था। सपा शासन के दौरान जमीन की खरीद की प्रक्रिया उसी दौरान पूरी हो चुकी है। उसके बाद आगे की प्रक्रिया अभी ठंडे बस्ते में है। स्टेडियम के निर्माण का कोई काम आगे नहीं बढ़ सका है।
रिपोर्ट दर्ज कर भूले अफसर
स्टेडियम के लिए ली गई जमीन से खूब मिट्टी खोदी गई। इससे वहां कई जगह तालाब बन गया। करीब ढाई साल पहले 17 जनवरी 2021 को तत्कालीन जिला स्पोर्ट्स अफसर वाईपी सिंह ने सदर कोतवाली में अज्ञात लोगों के खिलाफ मिट्टी चोरी की रिपोर्ट दर्ज करवाई थी। हालांकि उसके बाद आगे कोई कार्रवाई नहीं हुई। बीच-बीच में चोरी-छिपे खनन जरूर होता रहा। अब वहां नगर पालिका का कूड़ा पड़ रहा है।
कन्नौज जिला मुख्यालय पर तो स्टेडियम नहीं बन सका है। सौरिख क्षेत्र में जिस स्टेडियम का निर्माण हुआ था, उसकी भी सूरत बिगड़ी हुई है। सौरिख क्षेत्र के हरिभानपुर में उत्तर प्रदेश राजकीय निर्माण निगम ने 1006.61 लाख रुपये के बजट से स्पोर्ट्स स्टेडियम छिबरामऊ का निर्माण कराया था। वहां संसाधनों का अभाव है।
इस स्टेडियम में क्रिकेट, वॉलीबॉल, फुटबॉल, कुश्ती व कबड्डी आदि के खेलों की व्यवस्था है। लेकिन अभी तक खेलों के कोच तैनात नहीं किए जा चुके हैं। पिछले साल दो जुलाई 2022 से जिला क्रीड़ा अधिकारी नूर हसन अकेले स्टेडियम के संचालन की जिम्मेदारी संभाले हुए हैं।
उन्होंने बताया कि शुरुआती दौर में एथलेटिक, कुश्ती, हाकी के कोच थे लेकिन इनका ट्रांसफर होने के बाद दोबारा किसी की तैनाती नहीं हुई। उन्होंने बताया कि ग्रीन पार्क कानपुर में पिछले महीने छह जुलाई 2023 को मंडल समीक्षा बैठक हुई थी। कोच व कर्मचारियों की कमी को लेकर उपनिदेशक को अवगत कराया था।
उन्होंने जल्द ही तैनाती कराने का आश्वासन दिया है। यदि कोच मिल जाते हैं तो काफी हद तक समस्याएं स्वयं ही निस्तारित हो जाएंगी। इसके अलावा स्टेडियम में लिखा पढ़ी के काम के लिए चार वर्ष से किसी लिपिक तैनाती नहीं हुई है। लिपिक के न होने के कारण विभागीय कार्य के लिए 55 किलोमीटर दूर जिला मुख्यालय तक की दौड़ लगानी पड़ती है।