वर्ष 2005 में प्रलयंकारी बाढ़ से लोगों को बचाने के लिए शासन ने प्रशासन को दो मोटरबोट (स्टीमर) उपलब्ध कराए थे। शुरू के कुछ वर्षो में केन की बाढ़ के समय पीड़ितों को राहत भी मिली। मोटरबोट के जरिए प्रभावित लोगों को सुरक्षित स्थानों में पहुंचाया गया, लेकिन बीते चार साल से राजस्व विभाग ने इन मोटरबोटों से नजर फेर ली है। अलबत्ता धीरे-धीरे यह मोटरबोट कबाड़ हो गए।
वर्ष 2015 से दोनों मोटरबोट भूरागढ़ घाट किनारे पड़े हुए है। रखरखाव के आभाव में इनमें खास जम आई है। कीड़े मकौड़ों ने डेरा जमा लिया है। बाढ़ की तेजधारा को पार करने के लिए नाव के अतिरिक्त कोई साधन नहीं है। अफसर भी अनदेखी कर रहे है। सात सालों में किसी ने इन्हें दुरुस्त कराने की सुध तक नहीं ली। लगातार कई दिनों से हो रही बारिश से केन का जलस्तर बढ़ता जा रहा है। बाढ़ आई तो नदी किनारे आबाद बस्तियों के लोगों को बचाने के प्रयास विफल हो सकते है।
सात सालों से मानदेय भी नहीं मिला
कल्लू निषाद का कहना है कि 2005 में जिलाधिकारी के आदेश पर उन्हे बतौर चालक 4500 रुपये में नियुक्त किया गया था। लेकिन मोटरबोट खराब होने के बाद उन्हें न तो मानदेय मिला और न ही नए मोटरबोट आए। बाढ़ के समय मोटरबोट पीड़ितों की जान बचाने में बेहद काम आता था। प्रत्येक मोटरबोट में 12 सीट है, यानि एक बार में 24 पीड़ितों को इधर से उधर पहुंचाया जा सकता है।
पुराने कंडम, नए मांगे है मोटरबोट
दैवीय आपदा प्रभारी व एडीएम उमाकांत त्रिपाठी का कहना है कि दोनों मोटरबोट (स्टीमर) पीडब्ल्यूडी की तकनीकी जांच में कंडम पाए गए है। अप्रैल माह में ही शासन को मोटरबोट (स्टीमर) उपलब्ध कराने के लिए पत्र भेजा गया है। इसके पूर्व भी कई पत्र भेजे गए है। उधर, तहसीलदार पुष्कर का कहना है कि मोटरबोट के कंडम होने की जानकारी दैवीय आपदा विभाग को है।