उसने कोठरी के पास ही पक्का चबूतरा बनाया और लोगों से कहा कि जब उसकी मौत हो जाए तो यहीं पर दफना देना। लेकिन लोग उसकी बात को मजाक तो कोई सिरफिरा कहकर अनसुना कर देता। लेकिन जटाशंकर ने मंगलवार को अपना बाल मुंडवाए, पुरोहित बुलाकर खुद अपना दसवां और पिंडदान किया तो सभी सकते में आ गए। गुरुवार को अपनी तेरहवीं नाते-रिश्तेदारों के साथ ही पूरे गांव के लोगों को तेरहवीं की दावत के लिए आमंत्रित किया।
बुधवार को जटाशंकर ने खेत में बनाए गए समाधि के लिए बनवाए गए चबूतरे के पास अखंड रामायण का पाठ शुरू कराया। बड़ी बेटी शैल कुमारी ने बताया कि ने बताया कि पिता चार साल से खेत में ही रहते हैं और अपने हाथ से भोजन बनाकर खाते हैं। बताया कि पिता ऐसा क्यों कर रहे हैं, किसी की समझ में नहीं आ रहा। पत्नी रामप्यारी ने बात करने से इन्कार कर दिया।