तालग्राम/कन्नौज। इलाके के किसानों का रुझान परंपरागत फसलों की बजाय फूलों की खेती की तरफ बढ़ रहा है। इन दिनों गेंदा फूल की खेती से ज्यादा मुनाफे की ‘खुशबू’ आ रही है। कोलकाता की पौध से किसान का घर महक रहा है। किसान के गेंदा उत्पादन की खुशबू दिल्ली, जयपुर तक फैल रही है। किसान ने वर्ष 2016 में दो बीघा गेंदा की खेती शुरू की जो अब 26 बीघा में फूलों की खेती कर रहे हैं।
विकास खंड तालग्राम के मस्तियापुर निवासी मुकेश वर्मा ने बताया कि भाई विनय और शिवम के साथ दो बीघा में गेंदा की खेती आठ साल पहले शुरू की थी। तब से कलकतिया गेंदा की खेती कर रहे हैं। इस वर्ष 26 बीघे में फूल की खेती की है। इसके लिए कोलकाता से पौध मंगाई थी। जो 80 पैसे के हिसाब से प्रति एक पौध खरीद की गई। जून में गेंदा की रोपाई की थी। एक बीघा में 10 हजार पौध, खाद, दवाएं, सिंचाई व निराई गुड़ाई समेत 25 हजार रुपये की लागत आती है। 70 दिन में पौधे में फूल आना शुरू हो जाता है। 70 से 80 दिनों में 10 बार तोड़ाई होती है। कम से कम सात दिन में एक बार फूल की तोड़ाई की जाती है। एक बीघा में 20 से 25 क्विंटल उत्पादन मिल जाता है। 40 से 50 से रुपये किलोग्राम तक गेंदा के फूल बिक जाते हैं। पांच माह में गेंदा खेती से 75 से 90 हजार रुपये प्रति बीघा मुनाफा हो जाता है। शादी विवाह, स्वागत समारोह, धार्मिक अनुष्ठान समेत अन्य कार्यक्रमों में गेंदा के फूलों की सबसे ज्यादा मांग रहती है।
इनसेट
दिल्ली-जयपुर तक बिक्री को जाता गेंदा का फूल
किसान विनय ने बताया कि जिले की तिर्वा बाजार, गुरसहायगंज, छिबरामऊ व कानपुर, फर्रुखाबाद, औरैया, लखनऊ, उरई, जालौन के अलावा राजस्थान जयपुर, दिल्ली और नेपाल बार्डर तक निजी वाहन से बिक्री करते हैं।
फोटो :10: कृषि वैज्ञानिक डॉ. अमरेंद्र यादव। संवाद
गेंदा की खेती को प्रोत्साहन दिया जाता है। फूलों की खेती फायदे का सौदा है। इसमें लागत कम और मुनाफा ज्यादा होता है। कन्नौज व आसपास के जिलों में फूलों की खेती पहले से हो रही है। तालग्राम में भी कुछ जगह फूलों की खेती की ओर लोगों का रुझान बढ़ रहा है। गेंदा में मुरझा (म्लानि) व तना सड़न रोगों का प्रकोप ज्यादा होता है। यह मृदा जनित रोग हैं। झुलसा रोग का फूलों पर व्यापक प्रभाव होता है। गेंदा में फफूंद रोग का भी प्रकोप होता है। तना छेदक, चेपुआ, लाल मकड़ी भी लगती हैं। कीट नियंत्रण के लिए जैविक कीटनाशक का छिड़काव करें। मुरझा तना सड़न रोगों की रोकथाम के लिए रोपाई से पहले फोरट सल्फेट, ट्रायकोडर्मा को मिट्टी में मिलाने से लाभ मिलता है।
-डॉ. अमरेंद्र यादव, कृषि वैज्ञानिक
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अफ्रीकन में ज्यादा, फ्रेंच प्रजातियों में कम उत्पादन
कृषि तकनीकी सहायक प्रबंधक शिवपाल सिंह ने बताया कि गेंदा की फ्रेंच प्रजातियां कम उत्पादन देती हैं। इसके तहत गोल्डमजैम, बटर, बोलेरो, डस्टीलाल, रेडहेड फ्लेमिंगफायर, फ्लेम, ऑरेंजफ्लेम प्रमुख हैं। अधिक पैदावार देने वाली अफ्रीकन प्रजातियां है। ये हैप्पीनेस, गोल्डन एज, पूसा नारंगी गेंदा, पूसा बसंती गेंदा, गोल्डन कायन, स्टार गोल्ड प्रमुख हैं।