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Kannauj News: भाईचारे की मिसाल, सौ साल से रावण और कुंभकरण का पुतला बना रहे मुस्लिम कारीगर

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तालग्राम। विजय दशमी पर सलेमपुर रामलीला मैदान पर 35 से 40 फिट के रावण और 20 फिट के कुंभकरण के पुतलों का दहन होगा। जबकि रामलीला के दौरान लंका नगरी, नाव, द्रोणागिरी पर्वत, सोने के मृग के साथ अन्य पुतलों का निर्माण करीब सौ साल से अधिक समय से मुस्लिम कारीगर कर रहे हैं। यह परंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है।
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तालग्राम कस्बा के मोहल्ला गढ़ी पोखर निवासी मोहम्मद राशिद जाति धर्म के नाम पर वैमनस्यता मिटाने और इंसान को इंसान से मिलजुल कर रहने की प्रेरणा भी दे रहे हैं। मोहम्मद राशिद ने बताते हैं कि चार पीढ़ियों से रामलीला में पुतला बनाने की परंपरा चली आ रही है।
वर्ष 1912 में परबाबा करीम बख्श ने पुतला बनाने की शुरूआत की थी, इसके बाद बाबा इलाही बख्श ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया। अब्बा उस्ताद मोहम्मद मुनई से पुतला बनाने का काम सीखा था। उनका इंतकाल हो गया है। अब वह इस काम को 33 सालों से बखूबी निभा रहे हैं। वह अपने मजहब के ताजियों के अलावा हिंदू सनातन धर्म श्रीरामलीला के लिए पुतला बनाकर धर्म जाति की वैनमस्यता मिटाने का प्रयास कर रहे हैं।
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पुतला बनाने में लगता है यह सामान

कारीगर राशिद ने बताया कि 35 फिट के रावण और 20 फिट के कुंभकरण के पुतले को तैयार करने में करीब एक सप्ताह का समय लगता है। करीब 120 बांस, मैदा, शरीर बनाने में काले रंग के कागज व चेहरा बनाने में रंगीन कागज, कपड़ा, धागा, पटाखों का इस्तेमाल किया जाता है।



श्री रामलीला कमेटी के अध्यक्ष नवीन मिश्रा ने बताया कि शुरुआत से ही राशिद के पूर्वज पुतलों को बनाया करते थे। करीब तीन दशक के अधिक समय से राशिद ने कमान संभाली हुई है। मेहनत के बदले जो भी मुट्ठी बांध कर दे देते हैं, वह चुपके से स्वीकार कर लेते हैं।
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