तिर्वा। सिद्धार्थनगर से आए काला नमक चावल के बीज की किसान ने एक बीघा खेत में बोआई की और फसल लगभग तैयार हो गई है। जल्द ही क्षेत्र में काला नमक चावल की खुशबू महकेगी। अन्य चावल की तुलना में काला नमक चावल में आयरन तीन गुना और जिंक चार गुना अधिक होता है। इस चावल का डायबिटीज (मधुमेह) के रोगी भी सेवन कर सकते हैं।
तहसील क्षेत्र के करनपुर ड्योढ़ा गांव निवासी लाल सिंह राजपूत किसान है। उन्होंने बताया कि साले का बेटा प्रवेश कुमार कृषि विभाग सिद्धार्थ नगर में वैज्ञानिक पद पर तैनात है। सिद्धार्थनगर में काला नमक चावल की अच्छी पैदावार होती है और अच्छे भाव में बिकता है। कुछ दिनों पहले प्रवेश छुट्टी पर घर आया था। कुछ नया करने की उम्मीद से एक किलो काला नमक चावल का बीज लाया था। एक किलो बीज को एक बीघा खेत में बोया था। फसल तैयार हो गई। 15 दिनों में फसल की कटाई शुरू हो जाएगी। सामान्य फसल की अपेक्षा इस फसल की पैदावार अधिक लग रही है। करीब दस हजार रुपये प्रति क्विंटल के भाव से इसकी बिक्री होती है, जोकि सामान्य धान की अपेक्षा करीब तीन गुना अधिक है। कहा कि काला नमक चावल की खासियत यह है कि इस विशेष किस्म को बिना खाद और कीटनाशकों की मदद से तैयार किया गया है। जैविक खेती होने की वजह से इसकी खेती में खाद और कीटनाशकों का इस्तेमाल नहीं होता है, जिससे जेब का बोझ भी कम हो जाता है और फसल की लागत भी काफी कम हो गई है, लेकिन जहां तक उपज की बात है तो धान की अन्य किस्मों की तुलना में 40 से 50 प्रतिशत अधिक उपज देती है। इसकी एक और विशेषता यह है कि इसमें तना सड़न या भूरा धब्बा रोग की शिकायत नहीं आई है। सामान्य धान की फसलों में इस तरह का रोग लगने पर कई प्रकार की कीटनाशक दवा का उपयोग करना पड़ता है।
कॉफी और चाय की तुलना में अधिक होते एंटीऑक्सीडेंट
काला नमक चावल में कॉफी और चाय की तुलना में अधिक एंटी ऑक्सीडेंट गुण होते हैं, जिसके कारण यह स्वास्थ्य संबंधी कई बीमारियों के लिए फायदेमंद होता है। अधिक मात्रा में मौजूद एंटी ऑक्सीडेंट गुण शरीर को रोगों से लड़ने की शक्ति को बढ़ाते हैं।
सिक्किम, मध्यप्रदेश में होती अच्छी पैदावार
काला नमक चावल की खेती सबसे ज्यादा पूर्वोत्तर के राज्यों सिक्किम के मणिपुर, असम में होती है। अब काले चावल की खेती मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र समेत उत्तर प्रदेश के चंदौली, सिद्धार्थ नगर में भी शुरू हो गई है। ब्लैक राइस पकाने पर नीले-बैंगनी रंग में बदल जाता है। यही कारण है कि इसे नीला भात के नाम से भी पहचाना जाता है।