तालग्राम। पर्यावरण संरक्षण के लिए साल दर साल पौधे रोपे जाते हैं, लेकिन देखभाल के अभाव में यह सूख जाते हैं। इसके बाद फिर अगले साल पौधारोपण का लक्ष्य मिल जाता है। पुराने पौधे किसी जिम्मेदार का याद नहीं रहते हैं। इससे धरा का हरियाली से किया गया श्रृंगार बरकरार नहीं रह पा रहा है।
पांच जून को विश्व पर्यावरण दिवस पर प्रकृति के प्रति प्रेम और समर्पण का पाठ पढ़ाया जाता है। कुछ दिन बाद पर्यावरण प्रेम लुप्त हो जाता है। हर साल वन महोत्सव के तहत जुलाई में पौधा रोपण अभियान चलाया जाता है। लाखों की संख्या में पौधे रोपे जाते है। पिछले वर्ष आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे के ग्रीन बेल्ट में 20 हजार पौधे रोपे गए थे। वहीं पंचायत राज विभाग की ओर से ब्लॉक तालग्राम की 67 पंचायतों के गांव में खाली पड़ी जमीनी खेत खलिहान के आसपास 40 हजार पौधे लगाए गए। शिक्षा विभाग ने स्कूलों, स्वास्थ्य विभाग ने सीएचसी व पीएचसी, पुलिस ने थाने और वन विभाग ने भी लाखों की संख्या में पौधा रोपण कराया। बेहतर देखभाल न होने से बड़ी संख्या में सूख गए। कुछ जगह तो नामो-निशान मिट गया तो कुछ मवेशियों के निवाला बन गए।
वन विभाग को सिर्फ अपने लगाए पौधों से सरोकार
वन विभाग के साथ साथ अन्य विभागों को भी पौधा रोपण का लक्ष्य मिलता है और पौधे भी उपलब्ध कराएं जाते हैं। वन विभाग तो कुछ हद तक देख रेख करता है लेकिन अन्य विभाग रोपने के बाद लापरवाही बरतते हैं। जिससे एक माह तक पौधे जीवित नहीं रहते और सूख जाते हैं। इस ओर न तो शासन और प्रशासन ध्यान देता है। इस बारे में खुद यहां गुरसहायगंज के वन रेंजर राकेश कुमार चित्तौड़िया का कहना है कि वन विभाग की ओर से रोपित पौधों की देखभाल तो विभाग की ओर से की जाती है, लेकिन जो पौधे दूसरे विभागों को दिए गए हैं, उनकी देखरेख भी संबंधित विभाग की ही होती है।
-
शाक्ति वन उपेक्षित, नोडल अधिकारी का रोपित पौधा भी सूखा
तालग्राम। ब्लॉक तालग्राम में वन महोत्सव के दौरान महिला सशक्तिकरण के तहत बिरौली वन ब्लॉक के मायापुर्वा मार्ग किनारे एक एकड़ में पौधे लगा कर शक्ति वन विकसित किया गया था। प्रमुख सचिव नोडल अधिकारी श्रुति सिंह ने नीम और पूर्व मंत्री अर्चना पांडेय ने पाकड़ के पौधे लगाए थे। उनके नाम के शिल्पट भी लगाई गई थी। जिला प्रशासन ने लाव-लश्कर के साथ महिलाओं को जागरूक करने के लिए भीड़ भी जुटाई थी।
लापरवाही के आलम के चलते नोडल और पूर्व मंत्री के हाथों रोपे गए पौधे भी अब सूख गए हैं और लगी नेम प्लेटें गायब हो गई हैं। वहीं शक्ति वन का लगा बोर्ड भी मौजूद नहीं है। केवल जंगली बबलू के पौधे चल रहे हैं। जबकि सुरक्षा के लिए खाई खोद कर कंटीले तार लगाए गए थे। अब वन विभाग की अनदेखी से धीरे धीरे शक्ति वन अस्तित्व खोता जा रहा है।