झांसी। महानगर के जिस जिला और महिला अस्पताल को कायाकल्प अवार्ड मिला है, वहां पर रोजाना मरीजों को तमाम परेशानियों से जूझना पड़ता है। किसी अस्पताल में मशीन महीनों से खराब पड़ी है तो कहीं शौचालय पर ताला लटक रहा है। मरीजों को मोतियाबिंद के ऑपरेशन के बाद बेड तक मिलना मुश्किल हो जाता है। व्हीलचेयर ऐसी जगह रखी रहती है, जो दिखती ही नहीं। अमर उजाला द्वारा मंगलवार को अस्पतालों की पड़ताल में ये दुश्वारियां सामने आईं।
जिला अस्पताल में रोजाना करीब दो हजार मरीज ओपीडी में दिखाने के लिए आते हैं। यहां पर घंटों पहले लाइन में लगने के बाद जब डॉक्टर को दिखाकर मरीज दवा लेने आते हैं, तो कई दवाएं मिलती ही नहीं। ऐसे में पैसे खर्च करके बाहर से दवा खरीदनी पड़ती है। इन दिनों मोतियाबिंद के ऑपरेशन कराने के लिए खूब मरीज आ रहे हैं। रोजाना 60 से 70 ऑपरेशन होते हैं। ऑपरेशन के बाद कुछ घंटों के लिए मरीज आराम भी करते हैं। मगर इस बिल्डिंग में मरीजों को भर्ती करने के लिए सिर्फ 20 बेड ही हैं। ऐसे में कई मरीजों को जमीन पर बैठे रहते हैं। मंगलवार को पृथ्वीपुर से आए लखन ऑपरेशन से पहले बेड के पास बैठ गए थे। वहीं, दिव्यांग मानकुंवर को ऑपरेशन होने के बाद बेड नहीं मिला। किसी तरह लखन मानकुंवर को बेड देने के लिए तैयार हुए। मगर उन्होंने शर्त रख दी कि जैसे ही वो ऑपरेशन कराकर आएंगे, उनके लिए बेड खाली कर देना। इसी बिल्डिंग में शौचालय का गेट भी उखड़ा पड़ा है। वहीं, सीटी स्कैन मशीन तो पिछले तीन महीने से खराब पड़ी है। जबकि, निजी सेंटर पर ये जांच कराने पर चार से पांच हजार रुपये लगते हैं। ऐसे में प्राइवेट में जाकर जांच कराना हर किसी के बस में नहीं है। ओपीडी के मुख्य द्वार पर ही व्हीलचेयर रखी होनी चाहिए। मगर इसे दवा वितरण कक्ष के मेन गेट के बाहर कोने में छुपाकर रखा हुआ है, जिससे किसी भी मरीज की नजर इस पर नहीं पड़ती है। कई तीमारदारों को मजबूरी में अपने मरीज को गोद में उठाकर डॉक्टर को दिखाने और जांच कराने के लिए ले जाना पड़ता है। अस्पताल में लाखों रुपये खर्च करके बनकर तैयार हुए पीआईसीयू बिल्डिंग का कोई उपयोग उपयोग नहीं हो रहा है।
वहीं, महिला अस्पताल में भी शौचालय पर ताला लटक रहा है। रैन बसेरा में पलंग तो पड़े हैं, मगर इनमें चादर नहीं होती। साथ ही बिजली का बोर्ड खुला पड़ा है। ऐसे में किसी को भी करंट लग सकता है। मौजूदा समय में अस्पताल में पेट दर्द की दवा भी खत्म हो गई है। इन हालातों को देखकर तो लगता है कि जब कायाकल्प टीम निरीक्षण के लिए अस्पताल आई होगी, तो उन्हें सबकुछ दुरुस्त दिखाया होगा। तभी तीन-तीन लाख रुपये का पुरस्कार दोनों अस्पतालों को मिला है।
मरीज, तीमारदारों ने बयां किया दर्द
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10 दिन पहले मोतियाबिंद का ऑपरेशन कराने के लिए नंबर मिला था। दो घंटे से ऑपरेशन का नंबर आने का इंतजार कर रहा हूं। इससे पहले भी ओपीडी में दिखाने से लेकर फाइल बनवाने के लिए दो बार आ चुका हूं। - रामसेवक साहू।
मां का मोतियाबिंद का ऑपरेशन होना है। चार घंटे बाद भी नंबर नहीं आ पाया है। जबकि, 15 दिन पहले डॉक्टर ने आज की तारीख दी थी। तीसरी बार अस्पताल आना पड़ा। मऊरानीपुर से आने में 1500 रुपये किराए में खर्च हो चुके हैं। - कमलेश।
मां मानकुंवर दिव्यांग हैं। उनका मोतियाबिंद का ऑपरेशन हो चुका है। मगर भर्ती होने में बेड नहीं मिल रहा है। ऑपरेशन कराने जा रहे एक व्यक्ति ने कुछ देर के लिए बेड खाली कर दिया है। मगर उसने कहा है कि आते ही खाली कर देना। - सुरेश।
तीन दवाओं में दो ही मिली हैं। एक दवा 150 रुपये खर्च करके बाहर से खरीदनी पड़ी है। एक सप्ताह पहले भी अस्पताल में दिखाने आया था, तब भी कई दवाएं नहीं मिली थीं। करीब 700 रुपये की दवा बाहर से खरीदनी पड़ी थी। - अर्जुन।
सीटी स्कैन मशीन को निष्प्रयोज्य घोषित करने के लिए शासन को पत्र लिख गया है। मोतियाबिंद का ऑपरेशन कराने वाले मरीजों को सर्जिकल वार्ड में भर्ती किया जाता है। अस्पताल में पर्याप्त मात्रा में दवाएं हैं। - डॉ. आरके सचान, सीएमएस, जिला अस्पताल।