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बुजुर्ग और दिव्यांगों को 100 रुपये की दवा भी 20 किलोमीटर तक फ्री होम डिलीवरी कर रहे

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झांसी। फार्मासिस्ट का पेशा दवाओं के निर्माण से लेकर उनका विक्रय करने तक ही सीमित नहीं है। बल्कि, ये समाजसेवा का भी एक बड़ा माध्यम हैं। कोरोना काल में फार्मासिस्ट की उपयोगिता भी तेजी से उभरकर सामने आई, जब लॉकडाउन के बाद हार्ट, किडनी, लिवर, कैंसर समेत गंभीर बीमारियों से जूझ रहे मरीजों को घर-घर दवाओं की होम डिलीवरी शुरू की गई। इसके लिए झांसी के फार्मासिस्टों ने मोबाइल एप, सोशल मीडिया ग्रुप बनाकर दवाओं के ऑर्डर लेने शुरू किए। इसके जरिए संपर्क में आए बुजुर्गों और दिव्यांगों को शहर के एक केमिस्ट 20-20 किलोमीटर दूर तक नि:शुल्क होम डिलीवरी कर रहे हैं। कई अन्य फार्मासिस्टों ने भी नि:शुल्क कोविड किट बांटी। विश्व फार्मासिस्ट दिवस पर पेश है ये रिपोर्ट।
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जरूरतमंदों के लिए नहीं तय किए कोई मानक
वैराइटी दवा घर के संचालक विवेक सेठ ने कोरोना काल में लॉकडाउन के दौरान दवाओं की होम डिलीवरी करने के लिए सबसे पहले हामी भरी थी। वह बताते हैं कि कोरोना काल में मोबाइल एप तैयार करके दवाओं के ऑर्डर लेने शुरू किए, जिसे अभी भी जारी रखा है। उन्होंने बताया कि 400 रुपये से अधिक की दवाएं ऑर्डर देने पर ही वो नि:शुल्क होम डिलीवरी करते हैं। इस बीच उनसे कई ऐसे बुजुर्ग और दिव्यांग जुड़ गए, जो मेडिकल स्टोर पर आकर दवा खरीदने में असमर्थ थे। ऐसे जरूरतमंदों के लिए तो वो 100 रुपये की दवा की भी 20 किलोमीटर तक नि:शुल्क डिलीवरी कराते हैं।
यूनियन के जरिए कंपनियों पर दबाव बना मंगवाए रेमडेसिविर
झांसी केमिस्ट एसोसिएशन के सचिव नितिन मोदी ने बताया कि पिछले साल कोरोना की दूसरी लहर में रेमडेसिविर इंजेक्शन को लेकर मरीज बहुत परेशान थे। इसके अलावा खून पतला करने की दवाएं भी मार्केट में बड़ी मुश्किल से मिल पा रही थीं। ऐसे में उन्होंने यूनियन के नेताओं के जरिए कंपनियों पर दबाव बनवाकर झांसी के मरीजों के लिए दवाएं मंगवाईं। इसके अलावा जरूरतमंदों को ऑक्सीजन सिलेंडर गांव-गांव या फिर आसपास के जनपदों में ट्रेन, कार के जरिए पहुंचवाए। पुलिस कर्मचारी समेत फ्रंट लाइन वर्कर्स को 500 से अधिक कोविड किट (दवा, मास्क, सैनिटाइजर आदि) फ्री बांटी।
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तीन साल से बिना अवकाश लिए काम कर रहे हैं फार्मासिस्ट
महारानी लक्ष्मीबाई मेडिकल कॉलेज के परिसर में बने पोस्टमार्टम हाउस में फार्मासिस्ट संजय राजपूत पिछले तीन सालों से सेवाएं दे रहे हैं। मगर खास बात ये है कि इन्होंने एक भी दिन अवकाश नहीं लिया। कोरोना काल में भी वे अनवरत रूप से सेवाएं देते रहे। संजय ने बताया कि चिकित्सा क्षेत्र में चिकित्सकों से कम महत्वपूर्ण जिम्मेदारी फार्मासिस्टों की नहीं है। कई बार देर रात में भी पोस्टमार्टम कराने के लिए मेडिकल कॉलेज आना पड़ता है।
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