- रमजान का रोजा अफजल इबादतों में है शामिल
संवाद न्यूज एजेंसी
झांसी। मुकद्दस रमजान में रोजेदार रोजे रखकर परवरदिगार की इबादत में मशगूल हो जाते हैं। सबह सूर्योदय से सूर्यास्त तक भूखे प्यासे रहते हैं। लेकिन उलमाओं के मुताबिक रोजे में भूखे प्यासे रहने के साथ ही जुबान और शरीर के हर हिस्से की भागीदारी होती है। रोजा रखकर अच्छा अथवा बुरा काम करने का सीधा असर रोजे पर पड़ता है।
इस्लाम के मुताबिक पाक परवरदिगार ने रमजान के रोजों को अफजल इबादतों में शुमार किया है। रोजेदार की दुआ हर हाल में कुबूल होती है। रोजे के दौरान रोजेदार सुबह सूर्योदय से सूर्यास्त तक भूखे प्यासे रहकर इबादत करते हैं। लेकिन इस्लाम में रोजे का असल मकसद सिर्फ भूखे प्यासे रहना ही नहीं है। इसके साथ अपने जुबान, हाथ, पांव, आंख, दिमाग और शरीर के हर हिस्से का भी रोजा होता है। रोजा रखकर किसी की गीबत (चुगली) की जाती है तो उसका असर उसके रोजे पर भी पड़ता है। इसके साथ ही शरीर के किसी भी हिस्से से गलत काम होने पर रोजा टूट जाता है। रोजेदार सवाब की जगह गुनाह का हकदार हो जाता है। रोजा रखकर रोजेदार जितनी भी भलाई करता है उसे उतना ही अधिक सवाब मिलता है।
सिर्फ भूखे और प्यासे रहना ही रोजा नहीं होता है। भूख प्यास के साथ शरीर के हर हिस्से का भी रोजा होता है। रोजा रखकर रोजेदार जो भी काम करता है वह उसके रोजे में भी शामिल हो जाता है।
मुफ्ती साबिर कासमी
रोजा सबसे अफजल इबादतों में शामिल है। रोजेदार की दुआ कभी भी जाया नहीं होती है। भूखे प्यासे रहने के साथ ही लोगों की मदद और भलाई करना ही रोजे का असल मकसद है।
मुफ्ती इमरान नदवी