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Jhansi News: राम मंदिर में आंदोलन में भी आगे रहीं झांसी की वीरांगनाएं, काटी थी जेल

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अमर उजाला ब्यूरो
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झांसी। स्वतंत्रता संग्राम में वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई ने अपनी वीरता और शौर्य से देश दुनिया में झांसी का परचम लहराया। वहीं राम मंदिर आंदोलन में भी झांसी की महिलाओं ने बड़ी भूमिका निभाई थी। हजारों की संख्या में बाहर से आए कार सेवकों के भोजन का प्रबंध यहां की महिलाएं ही करती थीं। इतना ही नहीं, महिलाओं की आंदोलन में भी सक्रिय भागीदारी रहती थी, जिसके चलते पुलिस ने उन्हें जेल तक भेज दिया था। बावजूद, वह आंदोलन का हिस्सा बनी रहीं थीं। अब 22 जनवरी को अयोध्या में राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा होने जा रही है। ऐसे में इन महिलाओं की खुशी का कोई ठिकाना नहीं है। उनका कहना है कि राम मंदिर का निर्माण होना किसी सपने के हकीकत में बदलने जैसा है। हालांकि, उन्हें उम्मीद थी कि एक दिन रामलला अपने सही स्थान पर जरूर विराजमान होंगे।

आठ दिन महोबा जेल में रहीं थीं शशि
वीरांगना नगर निवासी शशिप्रभा मिश्रा की राम मंदिर निर्माण के आंदोलन में सक्रिय भूमिका रही थी। शशिप्रभा ने बताया कि आंदोलन के दौरान झांसी में बाहर से हजारों कारसेवक पहुंचे थे, जिन्हें अस्थायी जेलों में बंद कर दिया गया था, लेकिन पुलिस ने उनके खाने का कोई प्रबंध नहीं किया था। तब झांसी के हर घर में कार सेवकों के लिए अतिरिक्त खाना बनता था, जिसे इकट्ठा कर उन तक पहुंचाने की जिम्मेदारी उनकी होती थी। कार सेवकों की मदद करने में पुलिस ने आठ दिन के लिए उन्हें महोबा जेल भेज दिया था। उन्होंने कहा कि उन्हें पूरा भरोसा था कि अयोध्या में एक न एक दिन राम का भव्य मंदिर जरूर बनेगा।
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जेल से छूटते ही फिर सक्रिय हो गईं थीं गिरिजा
राम मंदिर आंदोलन के दौरान झांसी में पकड़े गए कार सेवकों की रिहाई के लिए कलक्ट्रेट में प्रदर्शन हुआ था, जिसमें गिरिजा तिवारी भी शामिल थीं। पुलिस ने सभी प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार कर लिया था और सभी को बस में भरकर महोबा जेल भेज दिया था। गिरिजा ने बताया कि उन्हें पता ही नहीं था कि पुलिस कहां ले जा रही है, बस से उतरने के बाद पता चला था कि पुलिस उन्हें महोबा ले आई है। महोबा जेल में वह 12 दिन बंद रहीं थीं। जेल से छूटने के बाद दुबारा से आंदोलन में सक्रिय हो गईं थीं।

कीर्तन कर इकट्ठा करती थीं महिलाओं को
अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के लिए महिलाएं भी अपनी भागीदारी दें, इसके लिए रजनी सेंगर भजन-कीर्तन के माध्यम से महिलाओं को इकट्ठा करती थीं। उन्हें आंदोलन में भागीदारी के लिए प्रेरित करती थीं। उन्होंने बताया कि ज्यादातर महिला जुलूस या प्रदर्शन का हिस्सा तो नहीं बनती थीं, लेकिन कारसेवकों के लिए भोजन का प्रबंध पूरे दिल से करती थीं। इसे महिलाएं राम का काज मानती थीं। यहां तक कि महिलाएं कार सेवकों को खाना पहुंचाने के लिए अपने छोटे-छोटे बच्चों को भी अस्थायी जेलों में भेज देती थीं। आंदोलन के दौरान रजनी को भी एक दिन के लिए जेल जाना पड़ गया था।
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चोरी-छिपे कारसेवकों के लिए खाना बनाती थीं उर्मिला
नरसिंह राव टौरिया निवासी उर्मिला देवी झा के भतीजे प्रदीप सक्रिय रूप से राम मंदिर आंदोलन से जुड़े थे। प्रदीप से प्रेरित होकर उनका भी आंदोलन के प्रति झुकाव हो गया था। उर्मिला बताती हैं कि उनके घर के पास के एक खाली मकान में कार सेवकों के लिए खाना बनाया जाता था। खाना बनाने के लिए मुहल्ले की कई महिलाएं दिन भर जुटी रहती थीं। सभी भजन गाती रहती थीं, ताकि पुलिस को शक न हो। झांसी में कर्फ्यू के दौरान भी यह क्रम जारी रहा था। खाना तैयार होने के बाद उन्हें कार सेवकों तक पहुंचाने की जिम्मेदारी भतीजे की होती थी। यह सभी काम पुलिस से छिपकर करने होते थे। उन्होंने बताया कि यह काम वे राम के लिए करती थीं।
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