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Jhansi News: टिकट मिलने के बाद पहली बार झांसी आईं थीं सुशीला नैय्यर, चार बार बनीं सांसद

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- तीन बार कांग्रेस ओर एक चुनाव भारतीय लोकदल के टिकट पर जीतीं
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अमर उजाला ब्यूरो
झांसी। झांसी-ललितपुर संसदीय सीट पर अब तक हुए लोकसभा के 17 चुनावों में डा. सुशीला नैय्यर ने चार बार जीत हासिल की थी। जबकि, चुनाव से पहले उनका झांसी से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं था। उनका जन्म पाकिस्तान में हुआ था और कार्यक्षेत्र गुजरात रहा था। कांग्रेस द्वारा प्रत्याशी घोषित किए जाने के बाद वह पहली बार झांसी आईं थीं। यहां तीन जीत उन्होंने कांग्रेस और एक भारतीय लोकदल के टिकट पर हासिल की थी। उनके कार्यकाल की उपलब्धियों को आज भी याद किया जाता है।
डा. सुशीला नैय्यर का जन्म पाकिस्तान के कुंजाह शहर में 26 दिसंबर 1914 को हुआ था। जबकि, दिल्ली के लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज से उन्होंने एमबीबीएस और एमडी की डिग्री हासिल की थी। इसी दरम्यान वह गांधी जी के संपर्क में आ गईं थीं और उनके करीबियों में शामिल हो गईं थीं। उनकी सार्वजनिक जीवन में सक्रियता बढ़ गई थी। सन 1952 में वह दिल्ली विधानसभा के लिए चुनी गईं थीं। इसके अलावा सन 1955 से 56 तक वह दिल्ली विधानसभा की अध्यक्ष रहीं थीं। सन 1957 के लोकसभा चुनाव में उन्हें अचानक पं. जवाहर लाल नेहरू ने झांसी-ललितपुर संसदीय सीट से कांग्रेस का प्रत्याशी घोषित कर दिया था। जबकि, इससे पहले वह कभी झांसी नहीं आईं थीं। प्रत्याशी घोषित होने के बाद पहली बार वह चुनाव से ठीक पहले झांसी आईं थीं। यहां अप्रत्याशित रूप से दो हजार से ज्यादा लोगों की भीड़ उनका स्वागत करने स्टेशन पर पहुंच गई थी। यहां चुनाव में उन्हें लोगों का अपार जनसमर्थन मिला था, जिसके बूते पर वह अपने पहले लोकसभा चुनाव में जीत हासिल करने में कामयाब हो गईं थीं। इसके बाद 1962 और 1967 में भी उन्होंने लगातार जीत हासिल की थी। उन्हें केंद्र में स्वास्थ्य मंत्री बनाया गया था। हालांकि, इसके बाद 1971 के चुनाव में कांग्रेस ने उन्हें टिकट नहीं दिया था। तब कांग्रेस के टिकट पर गोविंद दास रिछारिया ने जीत हासिल की थी। लेकिन, इसके अगले चुनाव 1977 में डा. नैय्यर ने भारतीय लोकदल के टिकट पर चुनाव लड़ा था और जीत हासिल करने में कामयाब हो गईं थीं। यह कार्यकाल उनका आखिरी था। इसके बाद उन्होंने राजनीति से संन्यास ले लिया था। इसके बाद वह अपने चिकित्सीय कार्यों में जुट गईं थीं। 000000
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टिकट घोषित होते ही रो पड़ीं थीं नैय्यर
अंतरराष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान के उपाध्यक्ष हरगोविंद कुशवाहा ने बताया कि चुनाव से पहले डा. नैय्यर का झांसी से कोई जुड़ाव नहीं था। बस रानी लक्ष्मीबाई की वजह से उन्होंने झांसी का नाम भर ही सुना था। लेकिन, 1957 में अचानक नेहरू ने उन्हें झांसी से प्रत्याशी घोषित कर दिया। यह सुनते ही वह रो पड़ी थीं। लेकिन, नेहरू के आदेश पर उन्हें यहां आना पड़ा था। इसके बाद वह यहां रच-बस गईं थीं। बड़े कद की नेता होने के बाद भी आम लोगों से उनका सीधा जुड़ाव रहता था। चार बार सांसद चुने जाने के बाद भी यहां उन्होंने घर नहीं बनवाया था। झांसी आने पर वह पार्टी के कार्यकर्ताओं के घर पर ठहरती थीं।
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झांसी के विकास में रहा अहम योगदान
इतिहासकार मुकुंद मेहरोत्रा ने बताया कि डा. नैय्यर का झांसी के विकास में अहम योगदान रहा है। उन्होंने चुनाव से पहले बुंदेलखंड क्षेत्र की स्वास्थ्य सेवाओं की बेहतरी के लिए यहां मेडिकल कॉलेज बनवाने का आश्वासन दिया था, जो उन्होंने पूरा किया था। इसके अलावा नोटघाट का पुल भी उन्हीं के कार्यकाल में बना था। वरना, पहले बेतवा नदी पार करने के लिए लोगों को नाव का सहारा लेना पड़ता था। यहां तक कि बस, ट्रकों को भी नाव पर चढ़ाकर नदी पार कराई जाती थी। अपनी उपलब्धियों की वजह से उन्होंने यहां के लोगों के मन में जगह बना ली थी। यही वजह थी कि वह एक चुनाव भारतीय लोकदल के टिकट पर भी जीतने में कामयाब हो गईं थीं।
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