अमर उजाला ब्यूरो
झांसी। स्वतंत्र भारत के संविधान के निर्माण में झांसी की धरती का अहम योगदान रहा था। यहां के पं. कृष्णचंद्र शर्मा को देश और दुनिया की गहरी समझ होने के चलते संविधान सभा का सदस्य बनाया गया था। संविधान के निर्माण के दौरान हुई सभी बैठकों में उनकी हिस्सेदारी रही थी। इसके अलावा हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिलाने में भी उनकी अहम भूमिका रही थी।
पं. कृष्णचंद्र शर्मा का जन्म चार अगस्त 1914 को सीपरी बाजार में हुआ था। उनके पिता पं. लक्ष्मीनारायण शर्मा रेलवे में स्टेशन मास्टर के पद पर कार्यरत थे, लेकिन वे नौकरी छोड़कर देश की आजादी की लड़ाई में कूद गए थे। पिता से ही पं. कृष्णचंद्र शर्मा को स्वतंत्रता आंदोलन का हिस्सा बनने की प्रेरणा मिली थी। देश की आजादी के आंदोलन में कई बार उन्हें जेल जाना पड़ा। इस दरम्यान उनकी पहचान प्रखर पत्रकार और शिक्षाविद् के रूप में भी हो गई थी। इतिहासकार हरगोविंद कुशवाहा ने बताया कि पं. शर्मा को देश और दुनिया के समसामयिक मुद्दों की गहरी समझ थी। इसके अलावा उनकी हिंदी, अंग्रेजी और उर्दू में बराबरी की पकड़ थी। इसी वजह से आजाद भारत के संविधान के निर्माण के लिए उन्हें संविधान सभा का सदस्य चुना गया था। यह काम भी उन्होंने पूरी जिम्मेदारी के साथ किया था। इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि संविधान के निर्माण के लिए दिसंबर 1946 से जनवरी 1950 के बीच हुई सभी बैठकों में पं. कृष्णचंद्र शर्मा शामिल हुए थे। इस दरम्यान उनके द्वारा लिखित में दिए गए कई सुझावों को संविधान में शामिल किया गया था। आगे चलकर पं. कृष्णचंद्र शर्मा लोकसभा के सदस्य बने। साथ ही महरौनी और ललितपुर से चार बार विधायक भी रहे। उन्होंने प्रदेश सरकार में मंत्री पद भी हासिल किया था। ललितपुर और महरौनी के विकास में उनका विशेष योगदान माना जाता है।