स्कूली छात्र-छात्राएं (सांकेतिक)
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खाते में आने वाला बच्चों की ड्रेस का पैसा पिता घरेलू या निजी कामों में खर्च कर देते हैं। इस कारण पिछले सत्र के कई विद्यार्थी बिना ड्रेस के स्कूल आ रहे हैं। शिक्षकों का भी कहना है कि 25 फीसदी से ज्यादा छात्र-छात्राएं ऐसे हैं, जिन्होंने पैसा आने के बाद भी नई ड्रेस नहीं खरीदी। वहीं, कई बच्चे ऐसे हैं, जिन्हें ड्रेस तो मिल गई मगर जूते-मोजे नहीं खरीदे जाने से वो हवाई चप्पल पहनकर स्कूल आ रहे हैं।
बेसिक शिक्षा परिषद के 1452 स्कूल संचालित हो रहे हैं। अब तक ड्रेस, जूते-मोजे, बैग और स्वेटर खरीदने के लिए परिषद द्वारा छात्रों के अभिभावकों के खाते में 1100 रुपये भेजे जाते थे। इस बार सौ रुपये पेन, पेंसिल की खरीद के लिए बढ़ाए गए हैं। पिछले सत्र में लगभग 1.45 लाख विद्यार्थी पंजीकृत थे। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 1.18 लाख छात्र-छात्राओं के अभिभावकों के बैंक खाते में ही यूनिफॉर्म, बैग आदि का पैसा पहुंचा। इस सत्र का पैसा आना बाकी है। अमर उजाला ने मंगलवार को नगर के कई स्कूलों की पड़ताल की। बेसिक प्राइमरी पाठशाला पुलिस लाइन, उच्च प्राथमिक विद्यालय कंपोजिट नई बस्ती, नगर क्षेत्र समेत कई विद्यालयों में कई पुराने छात्र-छात्राएं ऐसे मिले, जिनके अभिभावकों के खाते में पिछले सत्र में ड्रेस खरीदने का पैसा डाला गया था लेकिन उन्होंने भी नहीं खरीदी।
कई विद्यार्थी तो पुरानी ड्रेस पहनकर ही स्कूल आ रहे हैं। नई बस्ती के स्कूल की शिक्षिका प्रेमा देवी ने बताया कि जो भी विद्यार्थी ड्रेस में नहीं आते हैं, वह उससे पूछताछ करती हैं। यदि छात्र बताते हैं कि पैसा पापा ने खर्च कर दिए तो तुरंत अभिभावकों को स्कूल बुलाकर ड्रेस खरीदने को कहा जाता है। इसके बाद कई लोग अपने बच्चों को ड्रेस दिलवा देते हैं।
खाते में पैसा न आने का बनाते हैं बहाना
स्कूल में पढ़ाने वाले शिक्षकों ने बताया कि जब विद्यार्थी बिना ड्रेस के स्कूल आता है तो वो उसे टोकते हैं। फिर परिजनों को भी बुलाकर इस बारे में पूछताछ करते हैं तो वो कहने लगते हैं कि बैंक खाते में पैसा आया ही नहीं है। जब पासबुक मंगवाकर दिखाते हैं कि पैसा खाते में आ चुका है। तब जाकर कुछ लोग बच्चों को ड्रेस दिलाते हैं।