झांसी। वो भी कभी कर्जदार थे। कभी मौसम की मार, तो कभी फसल में लगने वाली बीमारी जैसी समस्याओं ने उनकी खेती को नुकसान पहुंचाया। लेकिन उन्होंने लीक से हटकर खेती में नए प्रयोग किए और आज उनके प्रयोग देशभर के लिए मिसाल बने हुए हैं। किसी किसान की आज खुद की चार प्रोसेसिंग यूनिट हैं, तो किसी किसान के मॉडल से देश में खेती को नई दिशा दी जा रही है। केंद्र सरकार से पद्मश्री सम्मान प्राप्त कर चुके किसानों की कहानी कुछ ऐसी ही है। रानी लक्ष्मीबाई केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय में किसान मेला और प्रदर्शनी में शुक्रवार को किसानों को अपनी सफलता का राज बताने आए इन समृद्ध किसानों से अमर उजाला ने बात की। किसानों ने बताया कि परंपरागत खेती को छोड़कर उन्होंने आधुनिक तरीका अपनाया तो लाभ मिला। उन्होंने किसानों के लिए खेती से जुड़े कई सुझाव भी दिए।
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उमाशंकर के मॉडल से बुंदेलखंड में 20 हजार किसानों ने मेड़बंदी की
2023 में बांदा के उमाशंकर पांडेय को पद्मश्री मिला है। उन्होंने बताया कि मेरी विधि वह है, जो हजारों साल पहले पुरखे पानी इकट्ठा करने के लिए करते थे। कुआं, तालाब बनाते थे। दुनिया का कोई वैज्ञानिक बादल बना नहीं और ला नहीं पाया। लेकिन भारत के पुरखे ऐसे थे, जो बादल बनाते थे और बादल को बुलाते थे और पानी बरसाते थे। मैंने उसी विधि को लेकर अभियान चलाया। खेत का पानी खेत में, गांव का पानी गांव में, घर का पानी घर में, जंगल का पानी जंगल में, नदी का पानी नदी में और तालाब का पानी तालाब में संरक्षित किया जाए। इसके लिए मॉडल मेड़बंदी शुरू किया। पहले यह मॉडल बांदा की 470 ग्राम पंचायतों में लागू हुआ। फिर एक लाख गांवों में और फिर जल शक्ति मंत्रालय ने उनके मॉडल पर 1050 जल ग्राम बनाए। आज पूरे बुंदेलखंड में 20 हजार किसानों ने उनके मॉडल के आधार पर मेड़बंदी की है। उन्होंने कहा कि इस मॉडल में कोई तकनीक नहीं लग रही है, कोई ट्रेनिंग नहीं लग रही। खेत पर मेड़ और मेड़ पर पेड़। मैं ये नहीं कहता कि बड़े पेड़ लगाइए, आप नींबू लगाइए, अरहर करौंदा, अंवाला, तुलसी लगाइए। उसके पत्ते खेत में गिरेंगे तो खाद बनेगी।
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परंपरागत खेती छोड़ बागवानी अपनाई, चार गुना तक आय बढ़ाई : रामसरन
पदमश्री प्राप्त कर चुके बाराबंकी के किसान रामसरन वर्मा ने बताया कि उन्होंने परंपरागत खेती की जगह बागवानी शुरू की। कुछ साल पहले तक पूर्वी यूपी में किसान बागवानी नहीं करते थे। उन्होंने केला, मैंथा, तरबूज, आलू, टमाटर की खेती शुरू की। इससे उनकी आय बढ़ी। उन्होंने बताया कि पहले परंपरागत खेती करके जहां 20 से 25 हजार रुपये एकड़ कमा पाते थे। अब टमाटर की खेती करके तीन से चार लाख रुपये एकड़, तरबूज से एक से सवा लाख रुपये एकड़ कमा सकते हैं। उन्होंने बागवानी को पूर्वी उत्तर प्रदेश में एक लाख हेक्टेयर में फैला दिया। इसलिए उन्हें पद्मश्री सम्मान मिला। उन्होंने कहा कि कई किताबों में पढ़ा था कि जो किसान फल, सब्जी की खेती करते हैं, वो धनी हैं। इसीलिए बागवानी शुरू कर दी। किसानों को रासायनिक खाद का इस्तेमाल न करने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि बुंदेलखंड में तरबूज, टमाटर की खेती करके किसान आय बढ़ा सकते हैं।
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कंवल सिंह ने शुरू की बेबी कॉर्न की खेती, आज चार प्रोसेसिंग यूनिट
सोनीपत के कंवल सिंह चौहान ने 1980 में धान की खेती शुरू की। कभी नफा तो कभी नुकसान होता रहा। वह कर्जदार हो गए। बताया कि 1997 में उन्हें पता चला कि बेबी कॉर्न की खेती करके ज्यादा आमदनी हो सकती है। उन्होंने इसकी खेती शुरू कर दी। जब उन्हें मुनाफा होने लगा तो पहले पड़ोस के किसानों, फिर गांव और बाद में पूरे क्षेत्र में किसानाें ने खेती शुरू की। उन्होंने किसानों को बेबीकॉर्न की खेती का तकनीकी ज्ञान दिया। बीज उपलब्ध कराए और उत्पाद की मार्केटिंग भी की। पहले पांच सितारा होटल, फिर बाजार में इनकी बिक्री की। एक प्रोसेसिंग इंडस्ट्री ने उनका उत्पाद लेने से मना कर दिया। इसलिए खुद ही प्रोसेसिंग यूनिट लगाने की ठानी। 2009 में पहली, 2012 में दूसरी, 2016 में तीसरी और फिर 2019 में चौथी प्रोसेसिंग यूनिट लगाई। आज इसमें लगभग 500 महिलाएं काम करती हैं। वहीं क्षेत्र के 10 हजार किसानों की आमदनी चार गुना तक बढ़ गई है। बेबी कॉर्न, स्वीट कॉर्न, मशरूम, टमाटर की खरीद वह किसानों से करते हैं। 2019 में उन्हें पद्मश्री सम्मान मिला।
सेठ पाल के मॉडल से रोज हो रही किसानों को आमदनी
सहारनपुर के सेठ पाल सिंह को 2022 में फसल विविधीकरण के लिए पद्मश्री सम्मान मिला। उन्होंने बताया कि वह पहले गन्ना, गेहूं, धान की खेती करते थे। उन्होंने इसके साथ सब्जी, दलहन, तिलहन की खेती और केंचुए का पालन शुरू किया। इससे उनकी भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ी। साथ ही रसायनों की निर्भरता कम हुई है। उन्हाेंने बताया कि गन्ना, गेहूं, धान की खेती सीजनल है। सिर्फ इसी की खेती करने से वह घाटे में थे। जब फसल विविधिकरण से सिंघाड़े, फूलों, सब्जी की खेती की तो उनकी आय बढ़ गई। कहा कि उन्होंने ऐसा मॉडल तैयार किया है, जिससे किसान को छह महीने में नहीं, बल्कि रोज आमदनी होती है।
चंद्रशेखर ने तैयार कीं धान, गेहूं की नौ उन्नत किस्में
झांसी। वाराणसी के चंद्रशेखर सिंह को 2021 में पद्मश्री मिला है। उनके द्वारा तैयार की गई धान और गेहूं की नौ किस्मों का पंजीकरण भी हो चुका है। अब वे बीज बनाकर बेचते हैं। बताया कि जब वह खेतों पर जाते थे, तो फसल की अच्छी किस्में खोजते थे। चयन पद्धति से अच्छी पैदावार और उच्च गुणवत्ता वाली फसलों का चयन किया। फिर खुद ही अच्छी किस्में तैयार कीं। पिछले साल उनका पांच करोड़ का टर्नओवर था। वह लोगों को रोजगार भी दे रहे हैं। कहा कि किसानों को जागरूक होना पड़ेगा। इस तरह के किसान मेले, कृषि संस्थानों का भ्रमण करके नई-नई तकनीक, उन्नत किस्मों आदि के बारे में जानकारी प्राप्त करनी होगी।