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पूर्वजों के श्राद्ध में मिठाई और पकवान...जिंदा को तिलांजलि

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झांसी। कहते हैं कि अपने पूर्वजों का श्राद्ध कर्म और पिंडदान करने से पूर्वज खुश होते हैं। घर-परिवार की खुशहाली का आशीष देते हैं। पितृ पक्ष भी शुरू हो चुके हैं। ऐसे में घर-घर लोग अपने पूर्वजों का श्राद्ध करने के लिए पकवान, मिठाई और दान-दक्षिणा की व्यवस्था कर रहे हैं, पंडितों को खाना खिला रहे हैं, लेकिन उन जिंदा बुजुर्गों का क्या जो अपनों के होते हुए भी वृद्धा आश्रम व सेवा सदनों में अपनी जिंदगी गुजारने को मजबूर हैं। यहां किसी को बेटों ने छोड़ा तो किसी को पति की मौत के बाद परिवारवालों ने अपने साथ नहीं रखा। झांसी के हंसारी टपरियन क्षेत्र में बने वरिष्ठ नागरिक सेवा सदन में ऐसे ही कई बुजुर्ग रह रहे हैं। इनमें महिलाओं की संख्या अधिक है। ये सभी अपने बच्चों और परिवार के साथ रहना चाहते हैं लेकिन परिवार और बच्चे हैं कि वह इन्हें सेवा सदन में रहने के लिए किराये और खाने का चार हजार रुपया महीना तो दे रहे पर उन्हें घर में रखना नहीं चाहते। वहीं, आईटीआई स्थित वृद्धाश्रम में भी 85 बुजुर्ग अपनों की राह देख रहे।
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अब तो आंसू भी नहीं निकलते
झांसी। 64 साल की बुुजुर्ग पुष्पा पति की मौत के बाद भाइयों के साथ झांसी आकर रहने लगीं। लेकिन पांच साल पहले भाई का घर छोड़कर वह सेवा सदन में रहने लगीं। परिवार की बात करें तो अक्सर वह पलकें झपका कर साड़ी में अपना मुंह छिपा लेती हैं, फिर कुछ क्षणों बाद बोलती हैं...देखो मैं कहां रो रही हूं, आंसू नहीं निकलते। पुष्पा कहती हैं कि अब सेवा सदन में रहने वाले लोग ही उनका परिवार हैं, वह अपना अंतिम समय यहीं गुजारना चाहती हैं...फिर अचानक कहती हैं कि कोई किसी का नहीं है और बोलते-बोलते गमगीन हो जाती हैं।
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भाई की चिता को आग देने भी नहीं आए परिवार वाले
झांसी। गुरुकुल विद्यालय गुमनावारा में एडमिनिस्ट्रेटर के पद पर रहे बाबू की बहन 75 साल की मंजू धर चार साल से आश्रम में दिन गुजार रही हैं। उनकी शादी कोलकाता में हुई थी। मां-बाप के गुजरने के बाद दोनों-भाई बहनों को परिवार के बाकी लोगों ने भी नहीं रखा। इससे दोनों किसी तरह झांसी आ गए। यहां भाई स्कूल में काम करने लगा। लेकिन भाई की मौत होने पर परिवार के लोग नहीं आए। स्कूल के छात्र राहुल पंडित ने मंजू धर के भाई का अंतिम संस्कार किया। अब मंजू अकेले आश्रम में दिन काट रही हैं। इनकी देखभाल का पैसा भी स्कूल की प्रधानाचार्य अर्चना गुप्ता देती हैं।
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मेडिकल अफसर थीं, अब सेवा सदन में रहने को मजबूर
झांसी। कुछ साल पहले ललितपुर के सिरोन में स्थित आयुर्वेदिक संस्थान से मेडिक ल अफसर के पद से रिटायर हुईं डा. आशा श्रीवास्तव अपने इकलौते बेटे के लिए रोती हैं। वर्ष 2006 में ब्लड कैंसर से इनके पति की मौत हो गई थी। डॉ. आशा बताती हैं कि रिटायरमेंट के बाद उन्होंने अपना 70-80 लाख रुपया अपने बेटे को यह सोचकर दिया कि वह बुढ़ापे में उनका सहारा बनेगा लेकिन बेटा उन्हें छोड़कर दिल्ली चला गया। घर में उसकी यादें पीछा नहीं छोड़ती थीं इसलिए वह आश्रम में रहने लगीं। अब भी बेटा आता है तो पेंशन के पैसे ले जाता है।
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बेटों के साथ रहने की इच्छा अब पूरी नहीं होगी
झांसी। अनीता चौबे के तीन बेटे हैं। शहर में ही बड़ा घर है। लेकिन घर में उनके लिए ही जगह नहीं है। पति की मौत के बाद वह बेसहारा हो गईं। वह बताती हैं कि घर से भाई उन्हें अपने साथ ले आए थे। बाद में सेवा सदन में आ गईं। आंखों में आंसू भरे बुजुर्ग अनीता ने कहा कि वह बुढ़ापे में अपने बेटों और पोते-पोतियों के साथ रहना चाहती हैं। लेकिन उनकी यह इच्छा लगता है कि अब कभी पूरी नहीं होगी। उन्हें सेवा सदन में रहने के लिए किराये के पैसे तो मिल जाते हैं, लेकिन वह पैसा नहीं बच्चों का प्यार चाहती हैं। अनीता 10 दिनों से आश्रम में रह रही हैं।
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छह महीने में पति और बेटे को खो दिया, परिवार ने मुंह मोड़ा
झांसी। रामकली ने वर्ष 2020-21 में महज छह महीने के भीतर कोरोना काल में अपने पति और इकलौते बेटे को खो दिया। इनके पति झांसी के फव्वारा बनाने की बड़ी ठेकेदारी का काम करते थे। बेटा भी बैंक में था। पति के बाद बेटा भी चला गया तो बाकी अपनों ने भी मुंह मोड़ लिया। लाखों रुपया होने के बाद भी कोई उनके बुढ़ापे की लाठी बनने को तैयार नहीं है। वह बताती हैं कि रोज-रोज की बातों से वह पांच महीने पहले सेवा सदन आश्रम में रहने लगीं। उन्होंने अपनी पूंजी अपने एक देवर के पास रख दी है। अब आश्रम के लोग ही उनके सुख-दुख के साथी हैं।
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बहन के अलावा कोई पूछने वाला नहीं
झांसी। राजगढ़ की माधुरी श्रीवास्तव बुढ़ापे में अपनी बहन के घर रहती हैं। इन दिनों उनकी बहन भी बीमार है। परिवार में और किसी ने साथ नहीं दिया तो वह आश्रम में आकर रहने लगीं। माधुरी बताती हैं कि बहन का इलाज चल रहा है। उन दोनों बहनों में बहुत प्रेम है। लेकिन परिवार के बाकी लोग उनसे दूर हो चुके हैं। बुढ़ापे में बहन ही उनका सहारा है। सेवा सदन में रहने और खाने का सारा पैसा भी उनकी बहन ही देती हैं।
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