अमर उजाला ब्यूरो
झांसी। ब्लीचिंग पाउडर समेत अन्य वस्तुओं की खरीद में 525 करोड़ के गोलमाल में फंसे जल संस्थान अफसर अब बयान दर्ज कराने के लिए सामने नहीं आ रहे हैं। हालत यह हैं कि जांच शुरू हुए करीब चार साल बीत गए लेकिन, अभी तक जांच अधूरी पड़ी हुई है।
जल संस्थान में ब्लीचिंग पाउडर, उपकरणों की खरीद एवं जलापूर्ति के लिए लगाए टैंकरों के चक्कर में हेरफेर का मामला सामने आया था। यह मामला सामने आने पर उप्र सतर्कता अधिष्ठान की ओर से छानबीन शुरू की गई। विजिलेंस ने जल संस्थान अफसरों से वर्ष 2005 से 2017 के बीच शासन से धनराशि का हिसाब देने को कहा लेकिन, जल संस्थान अफसर हिसाब देने को राजी नहीं हुए। जब विजिलेंस के हाथ दस्तावेज आए तब करीब 525 करोड़ रुपये का घोटाला सामने आया। छानबीन में मालूम चला कि स्टोर में सामान आए बिना करोड़ों रुपये का भुगतान कर दिया गया। टैंकरों के चक्कर भी मनमाने तरीके से दिखाकर पैसों का गोलमाल किया गया। जिनको टैंकर के नंबर बताए गए वह मोटर साइकिल और स्कूटर के नंबर निकले।
इस मामले में तत्कालीन महाप्रबंधक मंजू रानी, तत्कालीन महाप्रबंधक इंद्रदेव पांडेय, तत्कालीन अधिशासी अभियंता सुरेश चंद्र, अवर अभियंता डीपी राय, धर्मपाल सिंह, विजय बहादुर, इंद्रपाल सिंह, विलोक चौबे, तत्कालीन एक्सईएन कुलदीप कुमार समेत 32 अधिकारी एवं कर्मचारी के नाम सामने आए। विजिलेंस ने इनसे पूछताछ शुरू की। शुरू में कुछ अफसरों ने बयान दर्ज कराए लेकिन, अधिकांश बयान दर्ज कराने को ही राजी नहीं हो रहे। बयान दर्ज न होने से जांच की रफ्तार धीमी हो गई है हालांकि एसपी (विजिलेंस) आलोक शर्मा का कहना है कि जांच चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ रही है।