झांसी। कन्हैया की सबसे प्रिय कही जाने वाली गैया आज भूखी- प्यासी भटक रही हैं। यूं तो शासन ने गायों की देखरेख के लिए 30 करोड़ का सालाना बजट जारी किया है लेकिन हालात फिर भी सुधर नहीं रहे हैं। विभाग के आंकड़ों के मुताबिक आज भी 15 हजार गायें सड़कों पर हैं। इनमें एक बड़ी संख्या बीमार गायों की भी है। लंबी त्वचा रोग ने भी घेर लिया है।
यूं तो बुंदेलखंड में अन्ना पशुओं की समस्या खत्म करने के लिए गो आश्रय स्थल बनाए गए। झांसी में स्थाई एवं अस्थाई मिलाकर कुल 276 गो-आश्रय स्थल हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक यहां 37, 531 गोवंश ही संरक्षित हैं जबकि जनपद में कुल करीब 52 हजार अन्ना गोवंश चिन्हित हुए हैं। इस तरह करीब 15 हजार गोवंश सड़कों पर भटकने को मजबूर हैं। इन गोवंश को न खाना मिलता है, ना पानी। इनके पुर्नवास का भी कोई इंतजाम नहीं है। वहीं, गो-आश्रय स्थलों के रख रखाव में ग्राम पंचायतों को भी हिस्सेदारी करनी होती है। अपने हिस्से का खर्च बचाने की खातिर गो-आश्रय स्थलों पर क्षमता के मुताबिक गोवंश नहीं रखे जाते। बंगरा, मऊरानीपुर, मोंठ, गरौठा ब्लॉक की गोशालाओं में क्षमता से करीब पचास फीसदी कम गोवंश हैं। बड़ी संख्या में यह आवारा गोवंश ललितपुर राजमार्ग, बबीना राजमार्ग, कानपुर हाइवे समेत अन्य स्थानों पर दिखाई पड़ते हैं। समय पर खाना न मिलने से यह गोवंश सड़क किनारे पड़े दूषित खाद्य एवं पॉलीथिन खाकर ही गुजारा कर रहे हैं।
भूसा महंगा होने की वजह से छोड़े जा रहे गोवंश
भूसा के दाम में तेजी बनी हुई है। इस समय भी भूसा करीब 1500-1700 रुपये प्रति क्विंटल की दर से बिक रहा है। एक गोवंश पर रोजाना करीब दस किलो भूसा का खर्च है जबकि अधिकतम चार लीटर दूध ही मिल पाता है। काफी महंगा होने की वजह से पशुपालक गाय को बाहर छोड़ दे रहे हैं।
अन्ना गोवंश को गो-आश्रय स्थलों पर रखने की व्यवस्था है। इनकी निगरानी भी रखी जाती है। आवारा गोवंश की शिकायत मिलने पर उनकी खोज कराकर इनको आश्रय स्थल भेजा जाता है। गो-आश्रय स्थालों में भूसा की पर्याप्त व्यवस्था की गई है।
डा.विवेक कुमार
मुख्य पशु चिकित्साधिकारी