अमर उजाला ब्यूरो
झांसी। बुधवार को बुंदेलखंड विश्वविद्यालय में राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के उद्देश्यों पर आधारित अनुसंधान नवाचार एवं भारतीय ज्ञान परंपरा विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला की शुरुआत हुई। वक्ताओं ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा में विश्व का नेतृत्व करने की क्षमता है। भारतीय भाषाओं और ज्ञान परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए शोध की आवश्यकता है। बुंदेलखंड विश्वविद्यालय व शिक्षा संस्कृत उत्थान न्यास, नई दिल्ली द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित कार्यशाला में मुख्य अतिथि गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर आलोक कुमार चक्रवाल ने कहा कि विश्व की पुरातन सभ्यताओं में भारत का स्थान अग्रणी रहा है। इसका एक कारण यह है कि हमारे पूर्वजों ने सभ्यता, संस्कृति, वास्तु कला, विज्ञान, ज्योतिष, गणित आदि अनेकों ऐसे कार्य किए हैं, जिन्हें आज तक कोई नकार नहीं पाया है। शोधकर्ताओं की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह हमारी मूल ज्ञान परंपरा को आगे बढ़ाएं। शोध का उद्देश्य केवल एकेडमिक उपलब्धि प्राप्त करना नहीं होना चाहिए, बल्कि उससे समाज, राष्ट्र व विश्व की समस्याओं के समाधान का प्रयास करना चाहिए।
अध्यक्षता करते हुए बीयू की प्रभारी कुलपति प्रो. अपर्णा राज ने कहा कि बुंदेलखंड विश्वविद्यालय ऐसे कार्यक्रम का आयोजन कर अभिभूत है। इस राष्ट्रीय कार्यशाला से निश्चित ही भारतीय भाषा एवं ज्ञान पर आधारित शोधों को बढ़ावा मिलेगा। विशिष्ट अतिथि मध्य प्रदेश खाद्य आयोग के अध्यक्ष प्रो. वीके मल्होत्रा ने कहा कि नई शिक्षा नीति का उद्देश्य भारतीय ज्ञान परंपरा को ध्यान में रखकर अनुसंधान और नवाचार का है। शिक्षा एवं ज्ञान केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। शिक्षा नीति में इसीलिए कौशल विकास, प्रायोगिक प्रशिक्षण व सामाजिक उपयोगी शोध को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है।
कार्यशाला के संयोजक शोध प्रकल्प प्रो. तिमिर त्रिपाठी ने कहा कि इस प्रकल्प की शुरुआत 2017 में हुई थी। इसका उद्देश्य देश से आए विभिन्न प्रतिभागियों को भारतीय ज्ञान परंपरा की मूल भावना से अवगत कराना है।
राष्ट्रीय संयोजक भारतीय भाषा मंच डा. राजेश्वर कुमार ने कहा कि वर्तमान में अनेक शोध पीएचडी उपाधि के लिए विश्वविद्यालय में प्रस्तुत किए जा रहे हैं, लेकिन उनके सापेक्ष सामाजिक समस्याओं का समाधान नहीं हो पा रहा है। पूर्व शिक्षा पद्धति ने मूल्य विहीन प्रोफेशनल्स का उत्पादन किया है। जिनका प्रमुख लक्ष्य मानव सेवा न होकर धनार्जन है। हमारा समाज भी सेवा करने वाले की अपेक्षा धनाढ्य व्यक्ति का उपासक है। नई शिक्षा नीति पुनः मानवीय मूल्यों के साथ राष्ट्र प्रथम की अवधारणा वाले चित्रों का निर्माण करेगी।
इससे पूर्व कार्यालय संयोजक प्रो. अवनीश त्रिपाठी ने कहा कि इन दो दिनों में विभिन्न विशेषज्ञों द्वारा शोध में भारतीय दृष्टिकोण, आत्मनिर्भर भारतीय परिपेक्ष्य, कौशल विकास में नवाचार, आवश्यकतानुसार स्थानीय विषयों में शोध व नवाचार पर विचार विमर्श किया जाएगा।
कार्यशाला में डा. बिंदु सिंह, डा. संजय स्वामी, सुमित गुप्ता, श्रीराम चौथाई, डा. आशीष दवे, प्रो. आलोक कुमार, डा. धर्मेंद्र बादल, डॉ कौशल त्रिपाठी समेत देश के विभिन्न हिस्सों से आए 80 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। आभार डा. धर्मेंद्र बादल व संचालन डा. अनु सिंगला ने किया।