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बैटा, गौरामी मछली लगा सकती मच्छरों पर अंकुश

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झांसी। बुंदेलखंड विश्वविद्यालय के बायोमेडिकल साइंस विभाग के छात्र ने शोध में पाया है कि मच्छरों की संख्या कम करने के लिए बैटा और गौरामी मछली कारगर साबित हो सकती हैं। इन मछलियों को तालाब या भरे हुए पानी में डाल दें तो ये मच्छरों के लार्वा को तेजी से खाना शुरू कर देती हैं।
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बायोमेडिकल साइंस विभाग के डॉ. लवकुश द्विवेदी के निर्देशन में छात्र नमन मुदगिल ने ये शोध किया। छात्र ने बताया कि पहले गंबूशिया नाम की मछली को मच्छरों के लार्वा खाने के लिए इस्तेमाल किया जाता था मगर प्रकृति को नुकसान पहुंचाने की वजह से उनका प्रयोग अब नहीं होता है। शोध में जिन दो मछलियों बैटा और गौरामी का चयन प्रयोग हुआ, वे उसी वातावरण में पाई जाती हैं, जिसमें मच्छर के लार्वा पनपते हैं। इन मछलियों को अलग-अलग तापमान में भूखा रखकर लार्वा खाने की दर देखी। इस प्रयोग में गौरामी मछली की मच्छर के लार्वा खाने की क्षमता गंबूरिया मछली से भी ज्यादा मिली। जबकि, बैटा मछली लगभग गंबूशिया मछली के बराबर ही लार्वा खा पाई। छात्र ने कहा कि इन मछलियों को हम छोटे तालाबों या भरे हुए पानी में डाल दें तो मच्छरों की संख्या काबू में आ जाएगी।
ये आया सामने
शोध में पाया कि पानी के तापमान में बहुत उतार-चढ़ाव, कम ऑक्सीजन भी ये मछलियां सहन कर ले गईं। गौरामी मछली 24 घंटे भूखी रहने के बाद 170, 12 घंटे बाद 117 और छह घंटे बाद 56 लार्वा खा गई। जबकि, बीटा मछली 24 घंटे भूखी रहने के बाद 68, 12 घंटे बाद 72 और छह घंटे बाद 28 लार्वा खा पाई।
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