कोरोना के दौर में भी नगर निगम में फॉगिंग के नाम पर बड़ा खेल हो रहा है। निगम ने फॉगिंग के लिए खरीदी 60 मशीनों में से 37 का प्रयोग का किया। जबकि 23 मशीनें नई रखी रहीं। अब निगम के अफसर नई रखी मशीनों को वापस करने की जगह भुगतान करने की तैयारी कर रहे हैं। एक मशीन की कीमत 75 हजार रुपये है। ऐेसे में खर्च में कटौती की बात करना बेमानी साबित हो रही है। कोरोना संक्रमण को लेकर हुए लॉकडाउन के दौरान नगर निगम ने जैम पोर्टल के जरिये 60 पल्स फॉगिंग मशीनों की खरीद की थी। जिसमें से 37 मशीनों को महानगर में फॉगिंग के लिए प्रयोग किया गया। फॉगिंग का क्रम यह था कि 30 मशीनें एक दिन छोड़कर वार्ड में जाती थीं। जो दो दिन में 60 वार्ड कवर करती थीं। जबकि सात मशीनें सरकारी भवनों या अन्य शिकायतों पर भेजी जाती थीं। वहीं 23 मशीनें खरीद के बाद नई रखी रहीं। अब जब भुगतान की बारी आई, तो नई रखी रहीं मशीनों को वापस करने को लेकर सवाल उठने लगे। सवाल है कि एक ओर नगर निगम खर्च में कटौती की बात कर रहा है, तो दूसरी ओर नई रखीं रहीं मशीनों को वापस करने की बजाय भुगतान किया जा रहा है। इसे लेकर निगम में चर्चा का आलम है। बताया जाता है कि एक मशीन की कीमत करीब 75 हजार रुपये है। ऐसे में करीब 45 लाख रुपये का भुगतान किया जाना है, लेकिन निगम के अफसर मशीनों को वापस करने से कतरा रहे हैं। वहीं खरीद की प्रक्रिया के लिए गठित कमेटी के अफसर भी सवाल उठने के बाद फाइल को इधर से उधर घुमा रहे हैं। नगर निगम मेें जब मशीनों के भुगतान की फाइल दौड़ी, तो टीम में शामिल किए गए कई अफसरों ने हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया। इससे साफ है कि निगम अफसरों को भी फिजूलखर्ची को लेकर सवाल उठने पर कार्रवाई होने की आशंका है। फॉगिंग मशीनों के मामले में उपसभापति राजेश त्रिपाठी का कहना है कि जिन मशीनों का प्रयोग नहीं किया गया, उनको वापस कर देना चाहिए था। लेकिन ऐसा नहीं किया गया। इस मामले में अफसरों की भूमिका पर सवाल खड़े हो रहे हैं। बैठक में इसे लेकर जवाब तलब किया जाएगा। पार्षद किशोरी प्रसाद रायकवार का कहना है कि फॉगिंग के नाम पर मशीनों की खरीद में मनमानी की गई। जिन मशीनों का प्रयोग नहीं किया गया, उनको वापस किया जाना चाहिए।