झांसी। नौकरी और अच्छे कॅरियर के लिए युवाओं के डिप्रेशन में जाने के मामले तो वर्षों से बढ़ रहे हैं, लेकिन तनाव भरी जिंदगी अब छोटे-छोटे बच्चों से भी उनका बचपन छीन रही है। मनोवैज्ञानिकों और मनोचिकित्सकों के पास हर महीने ऐसे 45-50 केस पहुंच रहे हैं। 8-10 साल का बच्चा भी तनाव के चलते डिप्रेशन में जा रहा है।
मनोवैज्ञानिक बता रहे हैं कि ये स्थिति बच्चों के परफॉरमेंस और उनके बचपन पर बुरा प्रभाव डाल रही है। इसका मुख्य कारण पढ़ाई और स्टेटस सिंबल को लेकर माता-पिता या परिवार द्वारा डाला जा रहा दबाव है। मंडलीय मनोविज्ञान केंद्र में आ रहे केस देखें तो कक्षा तीन-चार से ही माता-पिता बच्चों की परफॉरमेंस को लेकर सख्त हो रहे हैं। इससे 8 से 13 साल तक के बच्चों के केस बढ़ रहे हैं।
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केस-1
आठ साल का एक बच्चा पढ़ने में होशियार था। उसके माता-पिता दोनों नौकरी करते हैं। दोनों बच्चे पर ध्यान भी बहुत देते हैं, लेकिन पढ़ाई का बहुत दबाव डालते हैं। उन्होंने बच्चे का ट्यूशन लगा दिया। बाद में कोचिंग भी लगा दी। दिन भर के दबाव से बच्चा तनाव में आ गया। क्लास में उसकी परफॉरमेंस गिरने लगी। वह चिड़चिड़ा हो गया। मनोवैज्ञानिक अब बच्चे की काउंसलिंग कर रहे हैं।
केस-2
कक्षा चार में पढ़ने वाले बच्चे पर घर और स्कूल में बेस्ट परफॉरमेंस देने का दबाव डाला जाता था। इससे बच्चा तनाव में आ गया। उसे जब भी घर या स्कूल में डांट पड़ती तो वह हिचकियां लेने लगता। माता-पिता कई दिन इस बात को समझ नहीं पाए। बार-बार ऐसा होने लगा तो वह उसे बच्चों के डॉक्टर के पास ले गए। वहां जांचें ठीक होने पर केस मनोचिकित्सक के पास पहुंचा तो पता चला कि बच्चा तनाव बढ़ने के कारण ऐसा कर रहा है।
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केस-3
कक्षा पांच के बच्चे का माता-पिता ने अच्छे परफॉरमेंस के लिए दूसरे स्कूल में दाखिल करा दिया। बच्चा नये स्कूल के माहौल में ढल नहीं पा रहा था। उसे ट्यूशन भी भेजा जाने लगा। बच्चे ने स्कूल को लेकर माता-पिता से बात भी की, लेकिन उसे अनसुना कर दिया गया। कुछ दिनों में डांट पड़ते ही बच्चा बार-बार खांसने लगा। उसकी श्वांस फूलने लगती थी। घरवालों ने डॉक्टर को दिखाया लेकिन फर्क नहीं पड़ा। बाद में काउंसलिंग से पता चला कि बच्चा तनाव में है।
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वर्जन
कम उम्र में ही पढ़ाई का अधिक दबाव छोटे बच्चों के लिए सही नहीं है। केंद्र में महीने में ऐसे 40-50 केस आ रहे हैं। कई केस में माता-पिता दोनों नौकरी में हैं। कई केस में सिर्फ मां जॉब कर रही है। पिता फिलहाल बच्चे को देख रहे...और दिन भर पढ़ाई के साथ अपना गुस्सा बच्चे पर निकाल रहे। इससे बच्चा तनाव व डिप्रेशन में आ गए। इसमें बच्चों के साथ माता-पिता की काउंसलिंग भी की जाती है।
डॉ. मनीष, मनोवैज्ञानिक, मंडलीय मनोविज्ञान केंद्र, झांसी
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आठ-दस साल से पंद्रह साल तक के बच्चों के महीने में 10-12 केस आ रहे हैं। तनाव या डिप्रेशन होने पर उन्हें डांट पड़ने पर खांसी आना, पलकें झपकाना, श्वांस तेज चलना, शरीर कांपना और बोलते-बोलते शांत हो जाने जैसी कई दिक्कतें हो सकती हैं। इस पर ध्यान न देने से परेशानी ज्यादा बढ़ सकती है।
डॉ. अर्जित गौरव श्रीवास्तव-मनोचिकित्सक
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ये बता रहे काउंसलिंग में
-बच्चे पर किसी भी तरह का दबाव न बनाएं, दूसरे से उसकी तुलना न करें।
-हर बच्चे की क्षमता अलग होती है, उसके गुणों को निखारने का प्रयास करें।
-बच्चे की हर बात ध्यान से सुनें और परेशानी का निदान जरूर करें।
-बच्चे को उसका बचपन जीने दें, अनावश्यक दबाव उसे बीमार बना सकता है।