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Jhansi News: बुंदेलखंड विश्वविद्यालय ने ढूंढा पोखर और तालाबों में सौंदर्य सामग्री का खजाना

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संवाद न्यूज एजेंसी
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झांसी। बुंदेलखंड के तालाब, पोखर और जलाशयों में कुदरत ने सौंदर्य सामग्री का खजाना छिपा रखा है। इन तालाब में जमा काई से वैकल्पिक ईंधन, सौंदर्य को निखारने वाली दवाएं और मवेशियों के लिए चारा बन सकेगा। साथ ही गंदे पानी की गुणवत्ता में भी सुधार होगा। यह बात बुंदेलखंड विश्वविद्यालय के शोध में सिद्ध हुई है।
संस्थान ने यह शोध इसी साल मार्च में स्पेन के बार्सिलोना में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में प्रस्तुत किया है। विवि की इस उपलब्धि पर दुनियाभर से आए वैज्ञानिकों ने भी मुहर लगाई है।
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तेजी से घट रहे जलस्तर को बचाने में जितने नदी, तालाब और पोखर उपयोगी हैं, उतना ही इनमें उगने वाले शैवाल भी महत्वपूर्ण हैं। यह तथ्य बुंदेलखंड विश्वविद्यालय के पर्यावरण विज्ञान विभाग के वैज्ञानिक और असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. एके गिरि ने पांच साल के शोध के बाद सिद्ध कर दिया है।
साल 2019 से महानगर के आंतियाताल और लक्ष्मीताल के शैवाल पर शोध के बाद उन्होंने पाया कि इसमें 70 प्रतिशत तक लिक्विड कंटेंट है। इसमें बायोमास, प्रोटीन और दूसरे केमिकल भी शामिल हैं। इसके अलावा इन तालाब में पांच प्रजाति के शैवाल हैं। यदि इन्हें उचित प्रक्रिया कर अलग किया जाता है तो इनसे सौंदर्य को निखारने वालीं दवाएं, वैकल्पिक ईंधन और मवेशियों के लिए चारा बनाया जा सकता है।
विश्वविद्यालय के इस शोध को मार्च में स्पेन के बार्सिलोना में आयोजित तेल, गैस, पेट्रोलियम विज्ञान व इंजीनियरिंग पर आधारित अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में प्रस्तुत किया गया। इसके बाद यहां आए विश्वभर के वैज्ञानिकों ने विवि के इस शोध को हाथों हाथ लेते हुए इसे अप्रूव भी कर दिया।
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यह है शैवाल और जलीय पौधों की उपयोगिता

वैज्ञानिक डॉ. एके गिरि ने बताया कि शोध में आंतियाताल और लक्ष्मीताल के साथ कुछ ऐसे जलाशयों को भी शामिल किया गया था, जहां शैवाल और जलीय पौधे होते हैं। इनके साथ कई सूक्ष्म शैवाल भी मिले हैं, जो सीवेज के पानी को शोधित कर सकते हैं। इससे पानी की गुणवत्ता में सुधार होगा। इसके अलावा इनमें माइक्रोएल्गल बायोमास का भी उत्पादन पाया गया है। इनसे वैकल्पिक ईंधन, दवाएं और चारा भी बनाया जा सकता है।



- भारत से इन संस्थानों ने लिया था हिस्सा
सम्मेलन में दिल्ली विश्वविद्यालय, जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय और बनारस हिंदू विवि के वैज्ञानिकों ने भी प्रतिभाग किया था।
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