झांसी। दिन, महीने, साल बीतते जा रहे हैं...। शहर के शहर बदल रहे हैं। कहने को तो बुंदेलखंड में भी बहुत कुछ बदल रहा है। लेकिन जो वर्षों से नहीं बदला वो हैं यहां के हालात..। दूसरे शहरों में जहां लोगों की सुबह एक कप चाय से शुरू होती है, वहां झांसी में आज भी एक बड़ी आबादी की सुबह हाथ में खाली बाल्टी लेकर पानी के जुगाड़ की जद्दोजहद से शुरू होती है।
यहां टैंकरों और हैंडपंपों पर पानी भरने के लिए अब भी भीड़ मधुमक्खी के छत्तों की तरह दिखती है। कारण सिर्फ एक ही है.. यहां आधे से ज्यादा शहर में पाइपलाइन से पानी ही नहीं आता। इससे नजर हटाएं तो बाजारों, गलियों और मुख्य सड़कों पर जाम भी ऐसा लगता है कि एक किलोमीटर की दूरी पार करने में दो-दो घंटे लग जाते हैं। वहीं, अन्ना जानवरों की समस्या का तो कहना ही क्या है...भीड़ भरे बाजार हों या हाईवे, अन्ना जानवरों के झुंड़ न सिर्फ लोगों की जान ले रहे हैं, ये बेजुबान खुद भी बेमौत मारे जा रहे हैं...। ऐसे में झांसी हो या ललितपुर या फिर बात समूचे बुंदेलखंड की करें...हर नया साल इनके लिए इन समस्याओं से छुटकारा पाने की सिर्फ आस लेकर आता है और दिन, महीने पूरे कर यूं ही निकल जाता है।
32 साल से परेशान दरीगरान की आबादी, चौकापाठा में 96 सालों में पाइपलाइन ही नहीं
झांसी के दरीगरान, अलीगोल, सरांय के लोगों ने सियासत के कई उतार चढ़ाव देखे हैं। यहां के लोग 1990 से पानी की समस्या झेल रहे हैं। कुछ क्षेत्र में पाइपलाइन है लेकिन कुछ जगह नहीं है। वहीं, 20 साल पहले नगर निगम की सीमा में शामिल हुए सिमरहा, सिर्गारा, भगवंतपुरा, भट्टागांव, नैनागढ़, गढ़ियागांव और चौकापाठा में पानी का भीषण संकट है। चौकापाठा में 96 साल के बुजुर्ग शिवदयाल बताते हैं कि इलाके में कभी पाइपलाइन ही नहीं देखी। तकरीबन 40 घरों की आबादी आधा किलोमीटर दूर लगे एक ही हैंडपंप पर निर्भर है। महिला लक्ष्मी, सविता और रश्मी यादव बताती हैं कई लोगों ने खुद के टैंकर खरीद रखे हैं। इसमें हर चौथे दिन 200 रुपये का पानी भरवाकर किसी तरह काम चलाते हैं।
कहीं टैंकरों पर निर्भर है आबादी, कहीं वर्षों से रात 2 बजे आता है पानी
सीपरी बाजार के मसीहागंज में पानी की आपूर्ति नहीं होती है। सर्दियों में भी टैंकरों से पानी की आपूर्ति होती है। खजूर बाग नई बस्ती की महिलाएं तो सड़क पर प्रदर्शन कर चुकी हैं। इन्हें कपड़े धोने और नहाने के लिए कई बार पास में मायके या रिश्तेदारों का सहारा लेना पड़ता है। ओरछा गेट बाहर, कपूर टेकरी, तालपुरा, काली माता मंदिर, सहित कई क्षेत्रों में हजारों लोग बाल्टी लिए दिखते हैं। वहीं, नगरा क्षेत्र के कई मोहल्लों में वर्षों से रात 2 से 3 बजे के बीच ही पाइपलाइन में पानी आता है। शिवाजी नगर क्षेत्र में पाइपलाइन जाम होने से एक साल से पानी नहीं आ रहा था। यही स्थिति शिवाजी नगर के डडियापुरा, नारायण क्षेत्र की है। मद्रासी कॉलोनी के वंश, बड़ागांव गेट के शिवम, बड़ागांव गेट बाहर के रामबाबू और नारायण बाग तिगैला के राजू साहू बताते हैं कि पानी के लिए गाड़ियों से डेढ़-दो किलोमीटर दूर जाना पड़ता है।
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अन्ना जानवर लोगों की मौत का कारण बने, कभी स्कूल में बंद किए गए, कभी छत पर चढ़े
-9 दिसंबर 2022 : हाईवे पर अन्ना जानवरों के झुंड से टकराकर किसान रामसेवक प्रजापति (70) की मौत हो गई। हादसे में उनका पोता गंभीर रूप से घायल हो गया।
-26 जुलाई 2022 : बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे पर जानवर को बचाने में कार हादसा हो गया। एक युवक अभिषेक की मौत हो गई। चार घायल हो गए थे।
-24 नवंबर 2021 : बार ब्लॉक के ग्राम कारीटोरन में तीन अन्ना जानवर सीढ़ियों के रास्ते एक घर की छत पर चढ़ गए थे।
-03 सितंबर 2019 : बार ब्लॉक करमई गांव के किसानों ने पुरापाचौनी पुलवारा ग्राम के एक स्कूल में सैकड़ों अन्ना जानवरों को बंदकर ताला लगा दिया था। अगले दिन बच्चे और शिक्षक स्कूल पहुंचे तो अफरातफरी मच गई थी। जिला प्रशासन और पुलिस ने ग्रामीणों को समझाकर जानवरों को बाहर निकलवाया था।
तीन वर्षों में मारे गए 450 से अधिक अन्ना जानवर
अन्ना जानवर सिर्फ झांसी ही नहीं, पूरे बुंदेलखंड के लिए बड़ी समस्या है। ये किसानों की फसल बर्बाद कर रहे हैं ये स्थिति तो विकराल है ही...इधर कुछ वर्षों से खाने की तलाश में इधर-उधर भटक रहे अन्ना जानवर अब खुद भी हादसों का शिकार हो रहे हैं। हालात ये हैं कि वर्ष 2022 में झांसी-खजुराहो राजमार्ग, झांसी-ललितपुर और झांसी कानपुर हाईवे पर ही आठ माह में 300 से अधिक गोवंश मारे गए। वर्ष 2020 में 11 महीनों में 163 अन्ना जानवरों की सड़क हादसों से मौत हो गई थी। कुल मिलाकर तीन वर्षों में 450 से अधिक अन्ना जानवर मारे गए। सितंबर 2022 में अन्ना जानवरों के एक सर्वे के मुताबिक झांसी में 52 हजार, ललितपुर में 40 हजार, जालौन में 29 हजार, हमीरपुर में 23 हजार गोवंश चिंह्ति हुए हैं। सरकारी आंकड़ों में झांसी में 172 गोआश्रय स्थल हैं। जबकि जालौन, ललितपुर, बांदा और चित्रकूट में 320 गोआश्रय स्थल हैं। इनके रख-रखाव में सालाना करीब 20 करोड़ खर्च होते हैं। इसके बावजूद बुंदेलखंड में करीब 35286 गोवंश सड़कों पर भटक रहे हैं।