झांसी। ओरछा के राजा वीर सिंह जू देव बुंदेला ने 1618 में मथुरा के विश्राम घाट पर विशाल दरवाजे का निर्माण कराया था। इस दरवाजे को तुला दरवाजा कहा जाता है। प्राचीन काल से ऐसी धार्मिक मान्यता रही है कि जो भी विश्रामघाट पर तुला दरवाजे का निर्माण कर इसके अंदर सोने के सिक्कों से तुलादान कर गरीबों को बांटेेगा उसके लिए यह तुला दरवाजा मोक्ष का मार्ग बन जाएगा। इसी मान्यता के मद्देनजर वीर सिंह बुंदेला ने विश्रामघाट पर विशाल दरवाजे का निर्माण कराया था, इस दरवाजे के ऊपर मंदिर की तरह गुंबद, नक्कारखाने बने होने के साथ ही यह स्थापत्यकला का बेजोड़ नमूना है। इसमें आज भी वीरसिंह जूदेव के नाम का शिलालेख लगा हुआ है। इस तरह के पांच दरवाजे विश्राम घाट पर बने हुए हैं, पर सबसे प्राचीन और पहला दरवाजा वीर सिंह बुंदेला के द्वारा बनवाया गया था। लक्ष्मण सिंह गौर की पुस्तक ओरछा का इतिहास और रस ब्रज रज कौ पुस्तक में ओरछा नरेश वीर सिंह जूदेव के इस तुला दरवाजा का उल्लेख है।
तुला दरवाजा को माना जाता है मोक्ष का द्वार
संत किशोर दास जी महाराज वृंदावन बताते हैं कि प्राचीन ग्रंथों में विश्राम घाट को विश्रांति तीर्थ भी कहा गया है। ऐसा कहा गया है कि यहां स्नान करने से स्वर्ग गंगा का फल प्राप्त होने के साथ ही मोक्ष का मार्ग खुलता है। इसी मान्यता के तहत सोलहवीं सदी में ओरछा के महाराजा वीर सिंह बुंदेला ने यमुना नदी के किनारे विश्राम घाट पर तुला द्वार का निर्माण करवाकर इसमें तुलादान कर गरीबों को सोने के सिक्के बंटवाए थे। मंदिर की तरह बने इस विशाल दरवाजे में वीर सिंह जू देव के नाम का शिलालेख भी लगा हुआ है। हिंदू धार्मिक मान्यता के अनुसार इस तुला दरवाजा को मोक्ष का द्वार माना जाता है। वराह पुराण में वर्णन आता है कि मथुरा के विश्राम (विश्रांति) तीर्थ के दर्शन मात्र से दीर्घ विष्णु व केशव देव के दर्शनों का पुण्य फल प्राप्त होता है। भगवान वराह वसुंधरे से कहते हैं कि मथुरा में विश्रांति तीर्थ पर स्नान व दान करने वाला व्यक्ति देव लोक में निवास करने का अधिकारी हो जाता है, क्योंकि विश्रांति तीर्थ में श्रीहरि निवास करते हैं।
मोक्ष की कामना के साथ कराया था तुला द्वार का निर्माण
ब्रज मंडल के नंदगांव निवासी भजन गायक दिनेश गोस्वामी बताते हैं कि ऐसी कथा है कि कंस को मारने के बाद भगवान श्रीकृष्ण ने इसी स्थान पर कुछ देर विश्राम किया था, इस कारण इसका नाम विश्राम घाट पड़ा। यहां पर श्रीहरि का निवास माना जाता है। इसी के चलते मोक्ष की कामना के साथ रियासतों के राजाओं ने घाट की सीढ़ियों पर तुला द्वारों का निर्माण कराया था। इस घाट पर कुल पांच तुला द्वार हैं, इनमें सबसे पहले 1618 में ओरछा के राजा वीर सिंह बुंदेला ने निर्माण कराया। इसके बाद दूसरा द्वार उदयपुर के राणा ने, तीसरा दरवाजा रीवा के राजा रघुराज सिंह ने, चौथा काशी नरेश ने व पांचवें द्वार का निर्माण अहमदाबाद के सेठ गोविंद मणिलाल ने कराया था।