- कई स्थानीय नेताओं से थी उनकी करीबी जान-पहचान
अमर उजाला ब्यूरो
झांसी। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का झांसी से गहरा नाता रहा है। जनसंघ की स्थापना के बाद से यहां उनका यहां आना-जाना शुरू हो गया था। एक बार तो उन्होंने साइकिल पर बैठकर चुनाव प्रचार किया था। कमोवेश लोकसभा और विधानसभा के सभी चुनावों में वह पार्टी के प्रत्याशियों के समर्थन में यहां आए। यही वजह थी कि झांसी के कई स्थानीय नेताओं को वह बेहद करीब से जानते थे।
जनसंघ की स्थापना के बाद से ही अटल बिहारी वाजपेयी राजनीति में सक्रिय हो गए थे। जल्द ही वह उत्तर भारत की सियासत का एक जाना-पहचाना चेहरा बन गए थे। सन 1952 में वह एक राजनेता के रूप में झांसी आए थे। यहां उन्होंने कार्यकर्ताओं के साथ साइकिल पर घूम-घूमकर चुनाव प्रचार किया था। यह वह दौर था, जब जनसंघ अपनी सियासी जमीन तैयार कर रहा था। इसके बाद से वाजपेयी का लगातार यहां जाना आना रहा। वाजपेयी के ग्वालियर जाते समय ट्रेन से यहां से गुजरते समय यहां के तमाम लोग उनसे मिलने स्टेशन पहुंच जाया करते थे। वाजपेयी भी यहां के कई नेताओं को नाम से जानते थे। यहां किले के मैदान में उन्होंने कई जनसभाओं को संबोधित किया। उनका भाषण सुनने के लिए दूर-दूर से लोग यहां आया करते थे। अयोध्या में ढांचा ध्वस्त होने के बाद लालकृष्ण आडवाणी, विनय कटियार व अन्य नेताओं को यहां अस्थायी जेल में यहां रखा गया था। वाजपेयी उनसे मिलने झांसी आए थे। आखिरी बार वह 1997 में वह यहां आए थे और भानी देवी इंटर कॉलेज में आयोजित कार्यक्रम में शामिल हुए थे।
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पिछड़ेपन की लगी हुई है होड़
पूर्व मंत्री रवींद्र शुक्ल ने बताया कि 1974 में अटल विहारी बाजपेयी ने यहां एक चुनावी जनसभा को संबोधित किया था। तब उन्होंने बुंदेलखंड की दुर्दशा को अपने कवि अंदाज में उठाया था। उन्होंने कहा था कि ‘दुनिया की दौड़ में हिंदुस्तान पीछे, हिंदुस्तान की दौड़ में उप्र पीछे और उप्र की दौड़ में अभागा बुंदेलखंड पीछे, मानो पिछड़ेपन की होड़ लगी हुई है।’ उन्होंने बताया कि वाजपेयी के भाषण के दौरान खूब भीड़ जमा होती थी। दूसरे दलों को समर्थन करने वाले भी अटल का भाषण सुनने के लिए आया करते थे।
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एक दुकान की छत पर सो गए थे वाजपेयी
अंतरराष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान के उपाध्यक्ष हरगोविंद कुशवाहा ने बताया कि अटल बिहारी वाजपेयी सादगी की मिसाल थे। वे जहां जाते थे, लोगों को अपना बना लेते थे। दूसरे दलों के लोग भी उनसे प्रभावित रहते थे। गर्मी के दिनों में एक बार झांसी दौरे के दौरान सराफा बाजार में उनका कार्यक्रम था। रात हो जाने की वजह से वह एक दुकान की छत पर सो गए थे और वहीं उन्होंने खाना खाया था। कई बार वह कार्यकर्ताओं के साथ बाइक पर बैठकर शहर के अलग-अलग हिस्सों में निकल जाया करते थे।