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- सर्जरी से पहले कहा था-पापा आपको कुछ भी होने नहीं दूंगा
अमर उजाला ब्यूरो
झांसी। उम्र सिर्फ 21 साल। मगर हौसला और इरादा इतना मजबूत कि खुद की जान पर जोखिम में डालकर पिता को नई जिंदगी दे दी और समाज के लिए मिसाल बन गए। हम बात कर रहे हैं झांसी के राहुल वर्मा की, जिनके लिवर से अब उनके पिता खुशहाल जिंदगी जी रहे हैं।
शिवाजी नगर के रहने वाले डॉ. अशोक वर्मा जालौन के स्वास्थ्य विभाग से मेडिकल ऑफिसर के पद से सेवानिवृत्त हैं। अप्रैल 2016 में सेवानिवृत्त होने से दो महीने पहले उनकी तबीयत अचानक से बिगड़ गई थी। मुंह से खून आने पर उन्होंने डॉक्टर को दिखाया तो पता चला कि उन्हें लिवर सिरोसिस बीमारी हो गई है। करीब चार साल तक उनकी दवाएं चलती रहीं। मगर 2020 की शुरुआत में उनकी तबीयत ज्यादा खराब हो गई। उनके पेट में पानी आ गया। पेट फूलने से भी उन्हें काफी तकलीफ होने लगी। एक दिन वह बेहोश हो गए। तब परिजनों ने दिल्ली के एक अस्पताल में उन्हें भर्ती कराया। डॉक्टर ने उनसे कहा कि अब दवाओं से काम नहीं चलेगा। जिंदगी बचाने के लिए लिवर ट्रांसप्लांट करना पड़ेगा। इसके लिए डॉ. अशोक ने एक महीने तक इंतजार किया कि किसी का लिवर मिल जाए। मगर उनकी तबीयत बिगड़ती देख बेटा राहुल खुद के लिवर का कुछ हिस्सा देने के लिए तैयार हो गया। जब उनकी सर्जरी होने वाली थी, उससे पहले बेटे ने कहा कि पापा आपको कुछ नहीं होने दूंगा। लिवर ट्रांसप्लांट होते ही सब ठीक हो जाएगा। डॉ. अशोक ने बताया कि अब वह और बेटा पूरी तरह स्वस्थ हैं।
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ऐसे होता है लिवर ट्रांसप्लांट
लिवर रोग विशेषज्ञ डॉ. रामप्रताप सिंह बुंदेला ने बताया कि किसी भी व्यक्ति के लिवर का कम से कम 30 प्रतिशत हिस्सा अपनी मूल मात्रा में वापस आ सकता है। लिवर दान करने के बाद दो से चार सप्ताह में यकृत सामान्य रूप से कार्य करने लगते हैं। लिवर लगभग एक वर्ष में धीरे-धीरे अपनी पूरी मूल मात्रा में वापस आ जाता है। इसलिए लिवर प्रत्यारोपण के दौरान डोनर के यकृत का कुछ हिस्सा निकालकर मरीज में ट्रांसप्लांट किया जाता है।