संवाद न्यूज एजेंसी
झांसी। एक दशक पहले जिस बीएसएनएल के सहारे ट्रेनों और रेलवे ने तकनीकी क्षेत्र में रफ्तार भरी थी, अब उसका साथ ही रेलवे को अखरने लगा है। खुद की इंटरनेट और संचार सेवा कंपनी रेलटेल बनने के बाद झांसी रेल मंडल और बीएसएनएल का 135 साल पुराना रिश्ता टूटने के कगार पर है। रेलवे ने झांसी-बांदा रेलवे लाइन पर अपनी कंपनी रेलटेल की इंटरनेट लाइन बिछाकर बीएसएनएल का साथ छोड़ दिया है। वहीं मंडल के अलग-अलग कार्यालयों में लगे 400 टेलीफोन भी सरेंडर कर दिए हैं।
एक जनवरी 1889 में झांसी स्टेशन से ट्रेनों का संचालन शुरू होने के साथ ही बीएसएनएल ने रेलवे को अपनी सेवाएं देनी शुरू कर दी थीं। एक छोर से दूसरे छोर तक ट्रेनों के संचालन में संचार माध्यम के तौर पर बीएसएनएल ने रेलवे का पूरा साथ दिया। इस दौरान रेलवे ने बीएसएनएल से ओवर हेड तार सेवाएं ली थीं। इससे रेलवे की पूरी सिग्नल प्रणाली काम करती थी।
धीरे-धीरे वक्त बदला तो रेलवे ने अपने स्तर पर आधुनिक तकनीक के साथ संचार सेवाएं विकसित करने का काम शुरू किया और खुद की संचार कंपनी रेलटेल खड़ी कर ली। इसके बाद से रेलवे ने किराये पर चल रहीं बीएसएनएल की सेवाओं को छोड़ना शुरू कर दिया। इसी कड़ी में झांसी मंडल ने झांसी से बांदा तक 192 किलोमीटर लंबे ट्रैक से बीएसएनएल की किराये की केबल हटाकर अपनी 6 क्वाड केबल बिछा ली है। वहीं, अब तक झांसी मंडल के कार्यालयों में लगे बीएसएनएल के 400 टेलीफोन भी सरेंडर कर दिए गए हैं। इन टेलीफोन से बीएसएनएल को हर साल 24 लाख रुपये मिलते थे। अब रेलवे स्टेशन पर बीएसएनएल के 107 ही टेलीफोन बचे हैं।
16 करोड़ से अपना नेटवर्क तैयार किया
झांसी-बांदा रेल लाइन पर रेलवे ने 16 करोड़ 47 लाख रुपये की लागत से 6 क्वाड इंटरनेट केबल बिछाई है। जिसका प्रावधान बजट में भी किया गया था। यह कार्य पूरा होने के बाद अब बीएसएनएल की कोई भी ओवर हेड लाइन रेल मंडल में नहीं बची है।
वर्जन
रेलवे में तकनीकी विकास और खुद के इंटरनेट प्रदाता होने के चलते बीएसएनएल के 400 टेलीफोन सरेंडर कर दिए हैं। हमारे पास बीएसएनएल की कोई भी ओवर हेडलाइन भी नहीं रह गई है।
मनोज कुमार सिंह, जनसंपर्क अधिकारी, झांसी मंडल।