तपन भरी गर्मी में एक माह में करीब 500 ट्रांसफार्मर जल गए। इन्हें बदलवाने में लोगों को नाकों चना चबाने पड़ रहे हैं। लोगों की मानें तो एक ट्रांसफार्मर बदलवाने में उन्हें चंदा लेकर चार से पांच हजार रुपये तक खर्च करने पड़ रहे हैं।
यह पैसा वाहन भाड़ा और विभागीय अधिकारियाें-कर्मचारियों की जेब गर्म करने में खर्च होता है। अभी भी 345 ट्रांसफार्मर मरम्मत की बाट जोह रहे हैं। जिले में 29 हजार 500 ट्रांसफार्मर लगाए गए हैं।
जिसमें सिर्फ शहर में करीब 550 ट्रांसफार्मर लगे हैं। शेष ग्रामीण अंचल में हैं। 50 से 60 किलोमीटर की दूरी तय कर लोग वाहन लेकर वर्कशाप में आते हैं और सुविधा शुल्क नही देने पर उन्हें दौड़ाया जाता है।
नया ट्रांसफार्मर लगवाने में दस से 15 दिन लग जाते हैं, यह स्थिति तब है जब ग्रामीण विभागीय अधिकारियों-कर्मचारियों की जेबें गर्म करने के साथ ही सिफारिश कराते हैं। जुगाड़ नही लगने पर एक से डेढ़ माह लोगों को अंधेरे में रहना पड़ता है।
ग्रामीणों का आरोप है कि उन्हें खुद पैसा खर्च कर ट्रांसफार्मर वर्कशाप में लाने और वापस ले जाने का खर्च उठाना पड़ता है। चाहे वह खंभा से ट्रांसफार्मर उतरवाना हो या फिर वर्कशाप में वाहन से उतरवाना या चढ़वाना हो, हर जगह पैसा खर्च करने पड़ता है।
शुक्रवार को ट्रांसफार्मर वर्कशाप अहियापुर पर महराजगंज के कोल्हुआ गांव निवासी राकेश सिंह, नीरज उमर, संतोष सिंह व सुरेंद्र प्रताप सिंह आए थे।
उन्होंने पूछने पर बताया कि उनके गांव में एक माह के अंदर दो बार ट्रांसफार्मर फुंका, हर बार लाइनमैन को 500 रुपये, इस्टीमेट बनाने के लिए जेई को डेढ़ हजार रुपये, वर्कशाप में ट्रांसफार्मर उतरवाने के लिए 200 रुपए और चढ़ाने के लिए 200 रुपए, फिर लाइनमैन को ट्रांसफार्मर जोड़ने का 500 रुपए दिया गया है। इतना ही नहीं वाहन का किराया डेढ़ हजार रुपए दिया गया है। इस तरह 44 सौ रुपये खर्च