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ट्रेनों की छुक-छुक नहीं, सुनाई दे रही कबूतरों के गुटरगूं की आवाज

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12-भंडारी रेलवे जंक्शन के टिकट काउंटर पर पसरा सन्नाटा। - फोटो : JAUNPUR
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जौनपुर। ट्रेनों की आवाजाही और यात्रियों चहलपहल वाला जौनपुर जंक्शन (भंडारी) रेलवे स्टेशन पर इन दिनों सन्नाटा पसरा हुआ है। जहां रुक-रुक कर ट्रेनों की सीटियां और छुक-छुक की आवाज सुनाई देती थी वहां सन्नाटे को केवल कबूतरों की गुटरगूं ही तोड़ती है। टिकट खिड़की से लेकर पूछताछ काउंटर और बेंच तक सूनापन पसरा है। प्रतीक्षालय में यात्री नहीं बल्कि वह खुद यात्रियों की प्रतीक्षा में खामोश है। कोरोना के भय ने स्टेशन को ऐसा लॉक किया है कि यहां की रौनक ही डाउन हो गई है।
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जंक्शन रेलवे स्टेशन से रोजाना नौ जोड़ी ट्रेनें गुजरती हैं। करीब 15 जोड़ी साप्ताहिक ट्रेनों की आवाजाही होती है। इन ट्रेनों में सवार होने के लिए 24 घंटे यात्रियों की आमदरफ्त जारी रहती थी। कोई ट्रेन पकड़ने आता था तो कोई यहां उतरकर आगे की राह पकड़ता था। हाथों में बैग-झोला और सिर पर उम्मीदों की गठरी लिए सबको यहां मंजिल तक पहुंचने की जल्दी ही रहती है। पिछले 23 मार्च के बाद से यहां न कोई कोलाहल है और न ही कोई जल्दबाजी। कार्यालयों पर ताले लटक रहे हैं। टिकट खिड़की, पूछताछ काउंटर, वेंटिंग हाल बंद पड़ा है। पूरे परिसर में दूर-दूर तक सन्नाटा है। जगह-जगह कबूतरों ने अपना घोसला बना लिया है। प्लेटफार्म का सन्नाटा तभी टूटता है, जब आरपीएफ और जीआरपी के जवान कभी भ्रमण पर निकलते हैं। प्लेटफार्म नंबर दो और तीन पर खड़ी ट्रेनों के पहिए थमे हुए हैं। इस प्लेटफार्म पर चाय-नाश्ते की कैंटीन चलाने वाले सिरकोनी के वीरेंद्र कुमार यादव सामानों की रखवाली के लिए लॉक डाउन के बाद से ही यहां जमे हुए हैं। उनका कहना है कि सामान्य दिनों में स्टेशन 24 घंटे चालू रहता है। इसलिए कोई न कोई यहां मौजूद ही रहता है, इसलिए सुरक्षा की चिंता नहीं रहती। बकौल वीरेंद्र, यह कैंटीन ही आजीविका का सहारा है, जो 42 दिनों से पूरी तरह ठप है। कब तक चालू होगा कोई भरोसा नहीं। ट्रेनें नहीं दौड़ेंगी तो हमारे जीवन की गाड़ी कैसे चलेगी। प्लेटफार्म नंबर एक पर बुक स्टॉल चलाने वाले जोगेंद्र सिंह भी भविष्य को लेकर चिंतित हैं। काउंटर बंद होने के बाद से उनकी जिंदगी ठहर गई है।
ट्रेनें क्या ठहरी, यहां जिंदगी ही ठहर गई
जौनपुर। स्टेशन के बाहर चाय-नाश्ता, ब्रेड, पानी की दुकानें पर जिंदगी ठहर सी गई है। इन दुकानों को चलाने वाले 30 परिवारों के सामने रोजी-रोटी का संकट पैदा हो गया है। इनका पूरा व्यवसाय रेलवे पर ही निर्भर है। जब से रेलगाड़ियों के पहिए थमे तब से उनकी जिंदगी भी ठहर गई। दुकानदार होने के कारण इनको कोई दिहाड़ी मजदूर भी नहीं मानता और कोई सुविधा नहीं मिल रही है। जयप्रकाश ने बताया कि चाय-नाश्ते से रोजाना दो हजार रुपये तक की बिक्री हो जाती थी, जिसमें 200-300 रुपये बच जाते थे। दुकान बंद होने पर 20 सदस्यीय परिवार का गुजर दुश्वार है। बच्चा यादव, अप्पू यादव, दीपक के भी हालात ऐसे ही हैं। उमेश चंद गुप्ता का कहना था कि चाट-पकौड़ी और पानी बेचकर ही पूरे परिवार का खर्च चलता है लेकिन अब सब बंद है। रंजीत ने बताया कि लोगों का परिवार दुकान से ही चलता था लेकिन अब सब बंद हो गया है।
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सिर्फ मालगाड़ी की ही आवाजाही
स्टेशन अधीक्षक वीपी सिंह के मुताबिक जंक्शन स्टेशन से रोज नौ जोड़ी ट्रेनें गुजरती हैं। इनके अलावा 15 साप्ताहिक ट्रेनें हैं। इससे तीन हजार से अधिक यात्री यहां से सफर करते हैं। लॉक डाउन के बाद से सिर्फ मालगाड़ी की ही आवाजाही होती है। सोमवार की रात श्रमिक स्पेशल ट्रेन आने से स्टेशन पर थोड़ी रौनक बढ़ी थी, मगर अब फिर से वही हाल है। शासन के निर्देश का इंतजार किया जा रहा है।
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