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नामांकन के लिए भी नहीं थे पैसे, चंदे के बल पर बनीं प्रधान....

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बक्शा। पंचायतों का चुनाव भी अब बेहद खर्चीला हो गया है। ऐसे में कोई ऐसा व्यक्ति चुनाव जीत जाए, जिसके पास नामांकन के लिए भी पैसे नहीं थे तो चौंकना लाजिमी है। बक्शा ब्लाक के भटपुरवां गांव ने पिछले चुनाव में ऐसा ही चौंकाने वाला कारनामा किया। रिश्तेदारों और पड़ोसियों के चंदे की बदौलत उनके आग्रह पर चुनाव मैदान में उतरीं प्रेमशीला को ग्रामीणों ने सिर-आंखों पर बिठाया और गांव का प्रधान बना दिया। इस बार नियम और आरक्षण में बदलाव की सुगबुगाहट के साथ गांव में चुनावी सरगर्मी तेज हो गई है। कई दावेदार अभी से सक्रिय हैं।
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करीब दो हजार की आबादी और 11 सौ मतदाताओं वाला भटपुरवा गांव पहले सुजियामऊ ग्राम पंचायत का ही हिस्सा होता था। परिसीमन के बाद नए ग्राम पंचायत के रूप में यह अस्तित्व में आया। गांव में अनुसूचित जाति के अलावा ब्राह्मण, मौर्य, यादव, मुसलमान, कुम्हार, कन्नौजिया जाति के लोग हैं। पहली बार पूर्ण ग्राम पंचायत क स्वरूप में आने के बाद यह सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हो गई थी। इससे पहले से चुनाव की तैयारी कर रहे अधिकांश दावेदार मायूस हो गए। तब ग्रामीणों ने प्रेमशीला कन्नौजिया को चुनाव मैदान में उतारा। प्रेमशीला के मुताबिक वह चुनाव लड़ने को तैयार नहीं थी। चुनाव लड़ना तो दूर उनके पास फार्म भरने के भी पैसे नहीं थे। पड़ोसियों ने जिद कर फार्म खरीदा और सभी औपचारिकताएं पूरी कराई। चुनाव में पूरा सहयोग भी उन्हीं का रहा। ग्रामीणों का सहयोग मिला और प्रधान चुन ली गईं। इस बार आरक्षण में बदलाव की आशंका में सामान्य, पिछड़ी जाति और एससी श्रेणी के अन्य दावेदार चुनावी मैदान में उतरने को कमर कसने लगे हैं। गांव में एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप और बैठक बाजी का दौर शुरू हो गया है। छोटी और नई ग्राम पंचायत होने के नाते दावेदार गांव के विकास की लुभावनी बातें और वादों को जनता के सामने रख रहे हैं। सड़क, बिजली, पानी, हैंडपंप, पेंशन, आवास जैसी योजनाओं का अधिक से अधिक लाभ गांव की जनता को देने का वादा कर रहे हैं।
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