गौराबादशाहपुर। रोजी-रोटी के चलते अन्य प्रदेशों में गए सैकड़ों परिवार लॉकडाउन के चलते अपने घर को लौट आए हैं। इस दौरान परदेश में तमाम तरह की दुश्वारियां झेलने वाले परिवारों के लोग अब गांव में ही अपनी राह बनाने में लगे हुए हैं। उनके इस प्रयास में महिलाएं भी सहयोग कर रही हैं।
संकट की घड़ी में अपने परिवार की गाड़ी को आगे बढ़ाने के लिए वह पति के साथ कंधे से कंधा मिलाकर पत्नियां काम करने को तत्पर हैं। इसके लिए वह अपने हुनर को माध्यम बना रही हैं। सिलाई-बुनाई, कढ़ाई से लेकर अचार-मुरब्बा बनाने तक के काम में वह तल्लीनता से जुटने लगी है, ताकि इसके जरिए होने वाली आमदनी से वह अपनी जरुरतों को पूरा करने के साथ ही पति का बोझ भी कम कर सकें। इन महिलाओं का कहना है कि परदेश में भी जीवन आसान नहीं है। घर से भी ज्यादा मेहनत वहां करनी पड़ती है और उसके बाद भी वहां कोई बुरे वक्त का साथी नहीं बनता। इससे बेहतर है कि गांव में ही रहकर कोई काम कर लें, जिससे सुखमय जीवन यापन हो सके। यहां भी अवसरों की कमी नहीं है, बस उसे भुनाने की क्षमता होनी चाहिए।
चिप्स-पापड़ का करेंगी कारोबार
भदेवरा गांव निवासी अनीता यादव अपने पति गंधर्व यादव के साथ मुंबई में रहती थी। गंधर्व एक कंपनी में कार्य करते थे। लॉक डाउन में एक ही घर में करीब डेढ़ महीने तक समय गुजारना पड़ा। इस दौरान तमाम दुश्वारियां भी झेलनी पड़ी। जैसे-तैसे वह अपने परिवार के साथ अपने गांव आ पाई। अब सरिता दोबारा शहर की ओर रुख नहीं करना चाहती हैं। वह गांव में ही खुद को आत्मनिर्भर बनाने में जुटी हैं। इसके लिए वह चिप्स, पापड़ बनाने में जुटी हैं। उनका कहना है कि इसे स्थानीय बाजारों में बेचेंगे। इससे जो भी आमदनी होगी, वह शहर में रहने के खर्चों की तुलना में कम ही होगा।
सिलाई-कढ़ाई करके करेंगी कमाई
मनिहागोविंदपुर गांव निवासी सलमा बानो अपने पति सोहराब के साथ दिल्ली में रहती थी। इनके पति दिल्ली में मार्केटिंग का काम करते थे। लॉक डाउन में वह दोनों घर आ गए हैं और अब यहीं रहने का मन बना चुके हैं। सलमा सिलाई-कढ़ाई और बुनाई में निपुण हैं। इसमें अपने कौशल को और निखारकर वह गांव में ही कोई काम शुरू करने की तैयारी में हैं। इसके लिए वह सरकार की योजनाओं का लाभ उठाने की सोच रही हैं। उनका कहना है कि सरकार जब मदद देने को तैयार है तो फिर परदेश जाकर धक्के क्यों खाया जाए। बेहतर है कि गांव में काम कर सुखमय जीवन जीएं।