शाही किले के पिछले हिस्से की दो वर्ष पहले गिरी दीवार।
गोमती तट पर स्थित ऐतिहासिक शाही किला की अभेद्य दीवारें दरकने लगी हैं। समुचित रख रखाव के अभाव में किला की दीवारों में लगे पत्थरों में जगह जगह दरारें पड़ रही हैं। कई स्थानों पर पत्थर दीवार से बाहर निकल आए हैं। सुरक्षा के लिहाज से कई जर्जर स्थानों को तार और बल्ली लगाकर घेरा गया है।
दो साल पहले बारिश के मौसम में ही शाही किला की पश्चिमी छोर की एक बुर्जी ढह गई थी। जिसका जीर्णोद्धार कराने के लिए चुनार से पत्थर लाकर काम शुरू किया गया, लेकिन आजतक काम पूरा नहीं हो सका। गोमती के किनारे की तरफ स्थित बारह दरी का भी अस्तित्व संकट में है।
किले के अंदर मौजूद बारह दरी में ही बादशाह के मंत्री आपस में राय मशविरा करते थे। किले के अंदर मौजूद टर्की हमाम को भी संरक्षण की दरकार है। किला के मुख्य गेट के बगल में स्थित मजार के आस पास की दीवारों में भी दरारें आ गई हैं। मुख्य गेट की छत से कई स्थानों से पत्थर निकल गए हैं।
शाही किले का निर्माण फिरोज शाह तुगलक ने 1332 ई. में कराया था। इस किले का भीतरी फाटक 26.5 फीट ऊंचा और 16 फीट चौड़ा है। केंद्रीय फाटक 36 फीट ऊंचा है। पूर्वी द्वार के अंदर की तरफ बनी मेहराबें इस किले की प्राचीन भव्यता की गाथा कहती हैं।
किले के अंदर मौजूद तुर्की शैली का स्नानागृह नवाब इब्राहिम के शासन काल में बना है। और मस्जिद इब्राहिम नैव बराक (फिरोज शाह तुगलक का भाई) ने बनवाया था। मस्जिद के मुख्य द्वार पर अभिलेख युक्त पाषाण स्तंभ रखा है। जिसकी तिथि 1760 ई. बताई जाती है।