ब्रिटिश हुकूमत से देश को आजादी मिलने से पहले ही स्वतंत्रता संग्राम सेनानी डाॅ. दयाशंकर ने केंद्रीय कारागार में कबूलपुर की रामलीला की पटकथा लिखी थी। बंदी के दौरान उन्होंने मन्नत मांगी थी कि देश की आजादी और अपनी रिहाई के बाद वे भगवान राम की लीला का मंचन कराएंगे।
सन 1947 में आजादी मिलने के बाद उन्होंने सन् 1948 से अपने पैतृक गांव कबूलपुर में श्री नारायण लीला समिति का गठन कर रामलीला का शुभारंभ करवाया। साहित्यकार डॉ. रामकुमार वर्मा, महादेवी वर्मा और रामचंद्र शुक्ल ने भी इस रामलीला के संवाद की सराहना की थी। प्रभु श्रीराम के जीवन मूल्यों को समाज में स्थापित करने के उद्देश्य ने कम समय में ही इस रामलीला को जिले में खास पहचान दिलाई। रामलीला में आने वाले खर्चे का वहन डॉ. दयाशंकर लाल स्वयं करते रहे। सन 1978 में उनके निधन के बाद इस रामलीला का मंचन कबूलपुर बाजार में किया जाने लगा। जो स्थापना के 76वें वर्ष इस साल भी जारी रही। इस समिति के जाने-माने कलाकार अशोक गुप्ता, अखिलेश सिंह, राम आसरे मिश्रा आदि ने बताया कि हम लोगों के ऊपर लगातार बेहतर प्रदर्शन करने का दबाव रहता है। यहां के भव्य मंच पर समिति से जुड़े एक दर्जन से अधिक गांवों के लोग स्वयं किरदार निभाते हैं। आजादी की लड़ाई में बढ़-चढ़कर भूमिका निभाने वाले और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के हाथों स्वतंत्रता के 25वें वर्ष में ताम्रपत्र से सम्मानित डॉ. दयाशंकर ने रामलीला के संवाद को केंद्रीय कारागार में कैद होने के दौरान लिखा था। श्रीरामचरित मानस, राधेश्याम रामायण के प्रसंगों को लेकर लिखे गए संवाद इसे अन्य रामलीलाओं से अलग करते हैं।