जौनपुर। कोरोना काल में बिगड़ते हालात से व्यवस्था पंगु हो चुकी है। संवेदनाएं खत्म हो गई हैं। तभी तो मरीज की जान बचाने के लिए परिजन हाथ जोड़कर गिड़गिड़ा रहे हैं, विनती कर रहे हैं, फिर भी उन्हें कोई मदद नहीं मिल पा रही। जिला अस्पताल में सोमवार को ऐसे कई मामले सामने आए। दूर-दराज से मरीज को लेकर इमरजेंसी में पहुंचे लोगों को बेड के अभाव में घंटों भटकना पड़ा। कोई मरीज को फर्श पर लेटाकर बेड खाली होने का इंतजार कर रहा था तो कोई एंबुलेंस में नाम मात्र के ऑक्सीजन के भरोसे जिंदगी की भीख मांग रहा था।कोविड मरीजों के लिए बने एल-2 अस्पताल में बेड भर चुके हैं। जिला अस्पताल में भी अलग से 30 बेड लगाकर कोविड के मरीजों को रखा जा रहा है। यहां प्रिजरमेटिव वार्ड भी बनाया गया है, जहां ऐसे मरीजों को रखा जा रहा है, जिनके लक्षण तो कोरोना के हैं, लेकिन रिपोर्ट पॉजिटिव नहीं है। इस वार्ड के भी सारे बेड भरे हुए हैं। कोई अन्य विकल्प न होने से मरीजों को भर्ती करने में दिक्कत हो रही है। प्रशासन का निर्देश है कि मरीजों को अस्पताल लाने से पहले कंट्रोल रूम को सूचित करें, मगर कंट्रोल रूम पर बस एक-दूसरे के नंबर ही दिए जा रहे। मजबूर तीमारदार जब अस्पताल पहुंच रहे हैं तो साफ तौर से बेड न होने की दलील देते हुए पल्ला झाड़ लिया जा रहा है। ऐसे लोगों को अस्पताल के बाहर ही तब तक इंतजार करना पड़ रहा है, जब तक कोई मरीज डिस्चार्ज या मर नहीं जाता।
केस एक
रिटायर्ड फौजी को भी नहीं मिला बेडरामपुर नद्दी गांव निवासी राजेंद्र सिंह (62) रिटायर्ड फौजी हैं। छोटे भाई की कोरोना से मौत हो चुकी है। पत्नी एल-2 में भर्ती हैं। उनका ऑक्सीजन लेवल कम होने पर पुत्र आशीष अस्पताल की इमरजेंसी में पहुंचा तो यहां नॉन कोविड वार्ड में बेड न होने की दलील दी गई। कंट्रोल रूम में फोन करने पर सीएमएस से बात करने को कहा गया। सीएमएस ने भी बेड न होने का हवाला दिया। डीएम, सीएमओ के नंबर पर भी संपर्क किया, मगर वहां से भी राहत मिली। निजी अस्पतालों में संपर्क करने पर ऑक्सीजन न होने का हवाला देते हुए इंकार कर दिया गया। पूरे दिन यहां-वहां भटकने के बाद भी शाम तक बेड नहीं मिल सका।
केस दो
एंबुलेंस के ऑक्सीजन पर अटकी रही सांसजलालपुर के हरिपुर निवासी अरुण गुप्ता को लेकर परिजन सोमवार को जिला अस्पताल पहुंचे। उन्हें सांस लेने में दिक्कत थी। ऑक्सीजन लेवल भी 80 से नीचे आ चुका था। एंबुलेंस में उपलब्ध ऑक्सीजन के भरोसे उनकी सांस चल रही थी। अस्पताल में संपर्क किया गया तो वहां बेड खाली न होने की बात बताई गई। कंट्रोल रूम ने सीएमएस का नंबर दिया और सीएमएस ने भी बेड का रोना रोया। थकहार कर सीएमओ को फोन किया गया, लेकिन फोन नहीं उठा। डीएम से संपर्क साधा तो फिर सीएमएस से बात करते हुए बेड की व्यवस्था करने को कहा गया। काफी देर तक भटकने के बाद भी बेड नहीं मिला। एंबुलेंस के बचे-खुचे ऑक्सीजन के सहारे घंटों वह गेट पर पड़ा रहा।