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शिवलिंग की गहराई का नहीं है अंदाजा

Tue, 26 Jul 2016 01:28 AM IST
ब्यूरो, अमर उजाला, जौनपुर
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मछलीशहर स्थित दियावां महादेव मंदिर। 
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 ऐतिहासिक और प्राचीन दियावां महादेव मंदिर परिसर सावन मास में ही नहीं बल्कि बारहों महीने भक्तों से गुलजार रहता है। सावन में हजारों की संख्या में श्रद्धालु यहां मत्था टेकते है। यह मंदिर अपने में 150 वर्ष पुराना इतिहास समेटे हुए है। भगवान शंकर के शिवलिंग की खासियत है कि यह चिकना न होकर खुरदरा है।
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   जमीन के भीतर इसकी गहराई कितनी है इसका अंदाजा किसी को नहीं है। इसको कोई नहीं जानता है। क्योंकि शिवलिंग की उत्पत्ति 150 साल पहले बड़े ही चमत्कारिक ढंग से हुई। जब शिवलिंग की खुदाई छह मीटर नीचे तक कराने के बाद भी इसकी जड़ का पता नहीं चल पाया था।

मंदिर के वंशानुगत पुजारी चन्द्रमा मिश्र ने बताया कि डेढ़ सौ वर्ष पूर्व मंदिर के स्थान पर जंगल हुआ करता था। यहां बगल के गंांव निवासी सुबेदार दूबे अपनी गाए चरने के लिए छोड़ दिया करते थे। शाम को जब गाये वापस लौटती तो उनके थनों से दूध गायब रहता था।
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शाम को गाए दूध नहीं देती थी। परेशान होकर सूबेदार इसका पता लगाने में जुट गए। वह गायों का पीछा करते जंगल तक पहुंच गए। उन्होंने देखा कि गाये कपास के एक पेड़ के पास बारी-बारी आकर खड़ी हो जाती थी, और उनके थनो से दूध स्वयं निकल कर गिरने लगता था।

ध्यान से देखा तो वहां एक पत्थर दिखाई पड़ा।   चूंकि उस पूरी जमीन के मालिक वही थे। इसलिए उन्होंने निर्णय लिया कि पत्थर उखाड़ कर घर ले जाएंगे  तो इस चमत्कारी पत्थर के कारण गाये घर पर ही दूध देगी। दो तीन दिन की खोदाई के बाद भी वह पत्थर को निकालने में सफ ल नही हुए।

क्योंकि पत्थर मिट्टी में बहुत नीचे तक दबा था। खोदाई की जानकारी जब दियावां गांव निवासी पंडित भगवती प्रसाद को हुयी तो वो भी मौके पर पहुचे। वह कुछ देर तक जायजा लेते रहे। कुछ देर बाद अचानक उन्हें नींद लग गयी। वही एक वृक्ष के नीचे सो गए। उन्हें स्वप्न हुआ की यह कोई साधारण पत्थर नहीं बल्कि भगवान भोलेनाथ का शिवलिंग है। 

 घंटे भर बाद जब निद्रा टूटी तो तुरन्त मौके पर पहुंच कर खोदाई रोकने को कहा। कहा कि उन्होंने स्वप्न में देखा कि वह पत्थर साधारण नही है बल्कि शिवलिंग है।उन्होंने सूबेदार दूबे को वहां मंदिर निर्माण के लिए राजी कर लिया। आजीवन वही रहकर शिवलिंग की पूजा पाठ का निर्णय लिया।

उनके बाद उनकी पत्नी नवंरगी देवी ने पन्द्रह साल तक पूजा की। नवंरगी की मृत्यु के बाद उनके पुत्र उमांशकर और वर्तमान में उनके पुत्र चंद्रमा मिश्र देखरेख कर रहे  है। बड़े आस्था के साथ आज भी क्षेत्र के लोग दर्शन पूजन के लिए आते हैं।
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