बदलापुर। सावन की पहचान कजरी और झूले से रही है। सावन की शुरुआत होते ही बागों में झूले पड़ जाते थे। बच्चों, महिलाओं की टोली झूला झूलते हुए कजरी गाते थे। सावन की शुरुआत के साथ गांवों में हर तरफ कजरी के सुरीली धुन गूंजनी शुरू हो जाती थी, जो भादो तक अनवरत चलता रहता था।
पूर्वांचल में मिर्जापुर, वाराणसी के साथ ही जौनपुर की कजरी प्रदेश में विख्यात रही है। कहीं खेत-खलिहानों में धान की रोपाई करते वक्त तो कभी झूला झूलते वक्त महिलाएं कजरी गुनगुनाती रहती थी। अपनी सुरीली आवाज में महिलाएं जब अपने पिया के प्रति विरह रस की संवेदना व्यक्त करती थीं तो हर कोई कायल हो जाता था। पूर्वांचल की माटी और लोक संस्कृति से जुड़ी कजरी के बोल अब मंद पड़ते जा रहे हैं। आधुनिकता की मार और कोरोना के प्रहार से इस बार तो कजरी के स्वर पूरी तरह गायब रहे। महिलाओं का कहना है कि युवा पीढ़ी पहले ही ऐसे आयोजनों से दूर होती जा रही है और अब ऐसे ही हाल रहे तो यह लोक विधा पूरी तरह विलुप्त ही हो जाएगी।
आज के आधुनिक संगीत के शोर में कजरी जैसे लोकगीत की स्नेहिल भावनाएं टूटती नजर आ रही हैं। कजरी जैसी भूतकाल की थाती को भविष्य तक संजोए रखने की नैतिक जिम्मेदारी हम सबकी होनी चाहिए। -डॉ ज्योति मिश्रा, सहायक अध्यापिका
भावी पीढ़ी को अपनी संस्कृति से परिचित कराते हुए कजरी जैसे लोक पर्व व लोकगीत को आज बचाने की जरूरत है। कजरी पूर्वांचल की परंपरा बनते हुए यहां की माटी में रच बस गई थी, मगर आधुनिकता के दौर में यह अब इतिहास के पन्नों की बात रह गई है। -डॉ विभा शुक्ला, प्रधानाध्यापिका।