राम-रहीम के रंग में रंगी पुरेंव की ऐतिहासिक रामलीला मिसाल है। 150 सालों से हो रही रामलीला में कौमी सौहार्द झलकता है। गांव के बुजुर्गों की मानें तो 1880 से गांव के कुछ लोगों ने बांस की सुपेली से मुकुट और बड़े चद्दर से पर्दा का प्रयोग कर रामलीला शुरू की थी। पूर्व में समिति के अध्यक्ष मुस्लिम रह चुके हैं। इसमें मोहम्मद शेरु खां ताड़का राक्षसी, कुंभकरण, साधु राजा का किरदार निभा चुके हैं।
बयालसी इंटर कॉलेज के प्रवक्ता डाॅ. कृष्ण पाल सिंह बताते हैं कि रामलीला में देश-विदेश में रहने वाले गांव के लोगों का भी सहयोग मिलता है। गांव के शिक्षक मनोज कुमार सिंह कहते हैं कि पहले समिति के पदाधिकारी सुबह ही गांव में रामलीला के लिए चंदा मांगने निकल जाते थे। आज करीब डेढ़ सौ साल से चली आ रही यह रामलीला कई बार बंद होने की कगार पर पहुंच गई थी, लेकिन ग्रामीणों के सहयोग से फिर उत्कर्ष पर पहुंच गई है। इस रामलीला में समय-समय पर मुस्लिम भाइयों का भी सहयोग मिलता रहा है। रामलीला में करीब 10 वर्ष पहले मुहम्मद मुस्तफा साज-सज्जा का कार्य देखते थे। पिछले वर्ष तक मुहम्मद शेरु खां, ताड़का राक्षसी, कुंभकरण, साधु राजा का किरदार निभाते थे। वहीं भोले साईं इस साज सज्जा के कार्य के साथ कुंभकरण का रोल अदा करते थे।