मछलीशहर। आश्विन कृष्ण पक्ष अष्टमी तिथि को संतान की रक्षा के लिए माताएं जीवित्पुत्रिका व्रत रहती हैं। इस साल यह व्रत तीन अक्तूबर शनिवार को पड़ रहा है। पं. देवीप्रसाद मिश्र बताते हैं कि जीवित्पुत्रिका व्रत आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को पुत्रवती महिलाएं अपने बेटे के दीर्घायुत्व के लिए करती हैं। यह व्रत संतान को बला एवं कष्टों से बचाता है। ज्योतिषाचार्य डॉ. शैलेश मोदनवाल बताते हैं कि इस व्रत के प्रभाव से अश्वत्थामा के अमोघ अस्त्र से उत्तरा के गर्भ की रक्षा हुई थी। परीक्षित को जीवन दान मिला था। भगवान श्री कृष्ण ने उत्तरा के गर्भ में सूक्ष्म रूप से प्रविष्ट होकर अश्वत्थामा के अमोघ अस्त्र को अपने ऊपर ले लिया और उत्तरा के गर्भ में पल रहे गर्भ की रक्षा की। तभी से यह व्रत जीवित्पुत्रिका के नाम से विख्यात हुआ।
ये हैं व्रत के विधान
पं. मुरारी श्याम पांडेय कहते हैं कि आश्विन कृष्ण अष्टमी के दिन स्नान आदि से निवृत्त हो भगवान सूर्य नारायण की प्रतिमा को स्नान कराकर गंधपुष्प, अक्षत, धूप दीपा से उनकी पूजा की जाती है। बाजरे व चने से बना भोग अर्पित किया जाता है। इस दिन स्त्रियां उड़द के कुछ साबुत दाने निगल जाती हैं। जिनका प्रयोजन भगवान कृष्ण के सूक्ष्म रूप को उदर में प्रवेश माना जाता है। इस दिन गेहूं व उड़द के दान का विशेष महत्व है। इस दिन ब्राह्मण को भोजन कराया जाता है। उन्हें दान दिया जाता है। व्रती महिलाएं अपने पुत्रों के गले में काले और लाल रंग के रक्षा सूत्र या धागे को पहनाती हैं। 24 घंटे के उपवास के बाद दूसरे दिन ब्रह्म बेला में दही चूड़े का भोग लगाकर उसका कुछ भाग पशु-पक्षियों के लिए निकाला जाता है और प्रसाद के रूप में महिलाएं ग्रहण करती हैं।