यूं तो टीबी अब सामान्य बीमारी हो गई है, लेकिन दवा लेने में लापरवाही से यह बीमारी सिर्फ मरीज के लिए ही नहीं बल्कि स्वस्थ लोगों के लिए भी घातक बन रही है। एमडीआर ( मल्टी ड्रग रेजिस्टेंस) टीबी के मरीजों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है। 45 लाख से अधिक की आबादी वाले इस जिले में टीबी के मरीजों की संख्या तकरीबन 6000 से अधिक है। इसमें एमडीआर टीबी के मरीजों की संख्या 165 है।
मरीजों के ये आंकड़े जिला क्षय रोग अधिकारी के कार्यालय में दर्ज हैं। विभागीय सूत्रों पर यकीन करें तो तकरीबन इतने ही मरीज सरकारी अस्पताल में न आकर झोलाछाप या फिर प्राइवेट डाक्टरों से इलाज करा रहे हैं। जिले में टीबी रोग के मरीजों के इलाज के लिए एक जिला क्षय रोग नियंत्रण केंद्र, 10 टीबी यूनिट, 50 डीएमसी और 500 डाट्स केंद्र स्थापित किए गए हैं।
टीबी के जिन मरीजों का पंजीकरण यहां कराया गया है उन्हें खुद स्वास्थ्य कर्मचारी अपने हाथ से दवा खिलाते हैं। ऐसी व्यवस्था इस लिए लागू की गई है कि मरीज खुद से नियमित दवा का इस्तेमाल नहीं करता है। जिस वजह से वह खुद सामान्य से एमडीआर टीबी में बदल जाता है और समाज के स्वस्थ्य लोगों के लिए भी खतरा साबित हो सकता है।
जिला क्षय रोग अधिकारी डा. नेम सिंह का कहना है कि टीबी की कुछ दिन दवा खाने के बाद आराम महसूस होने पर मरीज अपने से दवा खाना छोड़ देते हैं। यही उनके लिए सबसे बड़ा घातक कदम होता है। उनकी जब दोबारा दवा होती है तो उनके शरीर पर उस दवा का असर कम हो जाता है। शरीर में दवा का इतना रेजिस्टेंस क्रियेट हो जाता है कि सामान्य दवा काम नहीं करती। ऐसी ही दशा में मरीज एमडीआर टीबी की चपेट में आ जाता है।