मछलीशहर। महाशिवरात्रि भगवान शंकर की पूजा के लिए सर्वोत्तम दिन माना जाता है। इस दिन षोडश उपचार से शिव को मनाना आसान होता है। ग्रह पीड़ा से निदान को लेकर इस दिन किया गया शिवार्चन विशेष फलदायी होता है। ज्योतिष एवं तंत्र आचार्य डॉ. शैलेश मोदनवाल के अनुसार फाल्गुन मास कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि महाशिवरात्रि के रूप में जानी जाती है। इस वर्ष यह पर्व 26 फरवरी दिन बुधवार को पर रहा है। इस व्रत को करके मनुष्य अपने सब पापों से छूट जाता है और अनंत फल को प्राप्त करता है। इसमें एक हजार अश्वमेध तथा 100 वाजपेय यज्ञ का फल सम्मिलित है। शिवार्चन के दौरान मनुष्य पुष्प, दूध, कुशा, तिल, जल, अक्षत और सरसों से भगवान शिव के मस्तक पर अर्घ्य देता है। वह दस हजार वर्षो तक स्वर्गलोक में निवास करता है। दही और दूध से शिवलिंग को स्नान कराने वाला व्यक्ति रोग से मुक्त हो जाता है। जलाभिषेक में पात्र का भी विशेष महत्व होता है। शास्त्र के अनुसार तांबे, चांदी और सोने के कलशोें से जलार्चन करने पर क्रमशः सौ गुना फल प्राप्त होता है। गुग्गुल और अगुरु के धूप भगवान भोलेनाथ को प्रिय हैं। उनके सम्मुख उक्त धूप निवेदित करने वाला मनुष्य सुखों के साथ ही स्वर्ग को प्राप्त करता है। इसी तरह भगवान शिव को दीपक का दान करने वाला पुरुष कीर्ति तथा उत्तम नेत्र प्राप्त करता है। नैवेद्य अर्पण करने वाला मिष्ठान्न भोजी होता है। जो भक्त अखंड बेलपत्रों और भांति- भांति के पुष्पों से शिवलिंग की पूजा करता है वह एक लाख वर्षो तक स्वर्गलोक में निवास करता है।