केराकत। ब्लॉक के ग्राम भैसा निवासी गौरव पाठक बंटी आज के युवाओं के लिए नजीर हैं। जो लोग कहते हैं कि खेती किसानी से कुछ नहीं होता, उन्हें गौरव के जीवन से सीखना चाहिए। दक्षिण भारत में लाखों रुपये के सैलरी का पैकेज छोड़ कर गौरव ऑर्गेनिक खेती कर रहे हैं। रोजाना दो क्विंटल परवल बेच कर अच्छे पैसे कमा रहे हैं। यही नहीं इन्हें देख गांव के अन्य किसान भी ऑर्गेनिक खेती कर रहे हैं।
गौरव ने बताया कि वाराणसी के काशी विद्यापीठ से उन्होंने 2015 में एमकॉम की पढ़ाई की। यहां से प्लेसमेंट दक्षिण भारत के त्रिवेंद्रम स्थित भारत बेंज कंपनी में हुआ। एक साल से ज्यादा नौकरी के बाद गौरव के अवकाश प्राप्त प्रधानाध्यापक दादा जी के बीमार होने पर जब कंपनी से छुट्टी नहीं मिली तो गौरव ने इस्तीफा दे दिया। गौरव की मां और पिता दोनों दिव्यांग हैं। पिता को दोनों आंखों से दिखाई नहीं देता और मां शुरू से ही बोल और सुन नहीं पातीं। ऐसे में गौरव की गैरमौजूदगी में देखभाल उनके दादा जी करते थे।
गौरव ने बताया कि माता-पिता और दादा जी के बीमार रहने के कारण घर आ गया तो फिर आर्थिक समस्या होने लगी। तो केराकत ब्लॉक के द्वारा सीटू मैनेजमेंट ट्रेनिंग के लिए गोरखपुर गया। वहां ऑर्गेनिक खेती के बारे में जानकारी मिली। घर आकर 5 एकड़ के खेत में ऑर्गेनिक खेती की शुरुआत की। जिससे वर्तमान में फिर से लाखों रुपये की आय हो रही है। संवाद
घर पर बनाते हैं ऑर्गेनिक खाद
गौरव ने बताया कि वे पुआल के बदले गौशाला से जितना गोबर होता है, उसमें से दस से बीस ट्रैक्टर वो मंगवा लेते हैं। उसके बाद गोबर को घर पे बनवाए गढ्ढे में डालकर उसमें पानी डाल देते हैं। फिर नीम की खली और केचुवा डालकर चार से पांच महीने उसमें बस थोड़ा थोड़ा पानी डालकर उसे खाद बनाते हैं। आर्गेनिक खाद से दो बीघा परवल, डेढ़ बीघा मटर, पांच बिस्वा खीरा, पांच बिस्वा टमाटर, छह बिस्वा लतरा, दो बीघा कोंहड़े की पैदावार करते हैं। इससे साल में 10 से 12 लाख रुपये की आय हो जाती है।
वाराणसी, आस-पास के जिलों में सब्जी की आपूर्ति
गौरव ने बताया कि वर्तमान में वाराणसी, जौनपुर, मिर्जापुर, चंदौली, गाजीपुर के व्यापारी आर होटल संचालक उनसे अपनी जरूरत के मुताबिक सब्जियां लेकर जाते हैं। उपज ऑर्गेनिक होने की वजह से मांग बहुत है जिस कारण आपूर्ति नहीं कर पाते हैं।